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________________ २३० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उवसामणां * अपुब्वो हिदिगंधो पलिदोवमस्स संखेजदिभागेण हीणो'। ७३. सुगममेदं । * अणभागखंडयं सेसस्स अणंता भागा। $ ७४. अणियट्टिपढमसमये अणुभागखंडयसंकमो एत्तो पुन्वघादिदाणुभागसंतकम्मस्साणंते भागे गेण्हदि, तत्थ षयारंतरासंभवादो त्ति भणिदं होइ । * गुणसेढी असंखेजगुणाए सेढीए सेसे सेसे णिक्खेवो । 5 ७५. जहा अपुव्वकरणे समयं पडि असंखेजगुणाए सेढीए उदयावलियबाहिरे गलिदसेसायामेण गुणसेढिविण्णासो एवमेत्थ वि दट्टयो, ण तत्थ को वि परूवणाभेदो त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । गुणसंकमो वि पुवुत्ताणमप्पसत्थपयडीणमेस्थ अप्पडिहयपसरो पयदि ति घेत्तव्वं । णवरि हस्स-रइ-भय-दुगुंछाणं पि गुणसंकमो एत्तो पारभदि, तेसिमपुव्वकरणचरिमसमए उवरिदबंधाणं तहाभावपरिगदीए विरोहाभावादो । एवमेदेसु किरियाकलावेसु णाणत्ताभावं पदुप्पाइय संपहि एत्थतणो जो विसेससंभवो तप्पदुप्पायणट्टमुत्तरसुत्तमाह-- * अपूर्व स्थितिबन्ध पल्योपमका संख्यातवाँ भाग हीन होता है । $ ७३. यह सूत्र सुगम है। * अनुभागकाण्डक शेषका अनन्त बहुभागप्रमाण होता है । ७४. क्योंकि संयत जीव अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें अनुभागकाण्डकके संक्रमको इससे पूर्व पाते गये अनुभागसत्कर्मके अनन्त बहुभागप्रमाण ग्रहण करता है, उसमें अन्य प्रकार सम्भव नहीं हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। * तथा गुणश्रेणि प्रतिसमय असंख्यातगुणी श्रेणिक्रमसे होती है, जिसका उत्तरोत्तर गलित-शेष-आयाममें निक्षेप होता है । $ ७५. जिस प्रकार अपूर्वकरणमें प्रति समय असंख्यातगुणी श्रेणिक्रमसे उदयावलिके बाहर गलित-शेष-आयाममें गुणश्रेणिका विन्यास होता है उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए। वहाँ कोई प्ररूपणाभेद नहीं है यह इस सूत्रका भावार्थ है। गुणसंक्रम भीपूर्वोक्त अप्रशस्त प्रकृतियोंका यहाँपर बिना रुकावटके प्रवृत्त होता है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि हास्य, रति, भय और जुगुप्साका गुणसंक्रम भी यहाँसे प्रारम्भ होता है, क्योंकि अपूर्वकरणके अन्तिम समयमें उनका बन्धविच्छेद हो जाता है, इसलिए उनका उस प्रकार परिणमन होनेमें विरोधका अभाव है। इस प्रकार इन क्रियाकलापोंमें नानापनका कथन कर अब यहाँपर जो विशेष सम्भव है उसका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रको कहते हैं १. ता०-प्रती असंखेज्जदिभागेण इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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