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________________ २०६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चरित्तमोहणीय-उबसामणा णिक्खिवदि। सम्मतम्म विदियट्ठिदिपदेसग्गमोकड्डियूण अप्पणो पढमद्विदीए गुणसेढिसरूवेण णिक्खिवदि । एवं मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणं पि विदियट्ठिदिपदेमग्गमोकड्डियूण सम्मत्तपढमहिदिम्मि गुणसेढीए णिक्खिवदि । सत्याणे वि अधिच्छावणावलियं सोत्तूण समयाविरोहेण णिसिंचदि, अप्पणो अंतरविदीसु. ण णिक्खिवदि । सम्मत्तपढमद्विदीए सरिसं होद्णुदयावलियबाहिरे जं द्विदं मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्तपदेसग्गं तं सम्यत्तस्सुवरि समद्विदीए संकामेदि, जाव अंतरदुचरिमफाली ताव एसो चेव कमो। चरिमफालीए णिवदमाणाए जहा पुव्वं मिच्छत्त-सम्मामिच्छत्ताणमंतरद्विदिदव्यमोकडणासंकमेण अइच्छावणावलियं बोलाविय सत्थाणे वि देदि तहा संपहि ण संछुहदि । किंतु तेसिमंतरचरिमफालिदव्वं सम्मत्तपढमद्विदीए चेव गुणसेढीए णिक्खिवदि । सम्मत्तस्स चरिमफालिदव्यमण्णत्थ ण संछुहदि, अप्पणो पढमहिदीए चेव संछुहदि त्ति वत्तव्यं । पढमद्विदीए द्विदाए पढमद्विदिदव्वमुक्कड्डियण विदियट्ठिदीए ण संछुहदि, बंधाभावादो सत्थाणे चेव ओकड्डदि । विदियट्ठिदिदव्वं पि ताव पढमट्टिदीए आगच्छदि जाव आवलिय-पडिआवलियाओ सेसाओ ति । तत्तो परमागाल-पडिआगालवोच्छेदो। तत्तो पाए सम्मत्तस्स गुणसेढिविण्णासो त्यि । पडिआवलियादो चेव उदीरणा । आवलियाए समयाहियाए सेसाए सम्मत्तस्स जण्णिया द्विदिउदीरणा । द्वितीय स्थितिमें निक्षिप्त नहीं करता, किन्तु सवको लाकर सम्यक्त्वको प्रथम स्थितिमें निक्षिप्त करता है। तथा सम्यक्त्वकी दूसरी स्थितिके प्रदेश-पुञ्जका अपकर्षित कर अपनी प्रथम स्थिति में गुणश्रणिरूपसे निक्षिप्त करता है । इसीप्रकार मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भी द्वितीय स्थितिके प्रदेशपुजको अपकर्पितकर सम्यक्त्वकी प्रथम स्थितिमें गुणश्रेणिरूपसे निक्षिप्त करता है। स्वस्थानमें भी अतिस्थापनावलिको छोड़कर आगममें वतलाई गई विधिक अनुसार निक्षिप्त करता है, अपनी अन्तरसम्बन्धी स्थितियों में निक्षिप्त नहीं करता है। उदयावलिके बाहर सम्यक्त्वकी प्रथम स्थितिके समान होकर मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जो प्रदेशपुञ्ज स्थित है उसे सम्यक्त्वके ऊपर समान स्थितिमें संक्रमित करता है। अन्तरकी द्विचरम फालितक यही क्रम चालू रहता है। चरम फालिका पतन होते समय मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तर स्थितिसम्बन्धी द्रव्यको अपकर्षण संक्रमणके द्वारा अतिस्थापनावलिको छोड़कर जिस प्रकार पहले स्वस्थानमें भी देता रहा उसप्रकार इस समय नहीं देता है। किन्तु उनके अन्तरसम्बन्धी अन्तिम फालिके द्रव्यको सम्यक्त्वकी प्रथम स्थितिमें ही गुणश्रेणिरूपसे निक्षिप्त करता है। तथा सम्यक्त्वकी अन्तिम फालिके द्रव्यको अन्यत्र निक्षिप्त नहीं करता है, अपनी प्रथम स्थितिमें ही निक्षिप्त करता है ऐसा कहना चाहिए। प्रथम स्थितिके रहते हुए प्रथम स्थितिके द्रव्यको उत्कर्पितकर द्वितीय स्थितिमें निक्षिप्त नहीं करता है, बन्धका अभाव होनेसे स्वस्थानमें ही अपकर्षण द्वारा निक्षिप्त करता है। द्वितीय स्थितिका द्रव्य भी तभीतक प्रथम स्थितिमें आता है जबतक आवलि-प्रत्यावलि शेष रहती हैं। उसके बाद आगाल और प्रत्यागालका विच्छेद हो जाता है। वहाँसे लेकर सम्यक्त्वका गुणश्रणिविन्यास नहीं होता। मात्र प्रत्यावलिमेंसे उदीरणा होती है । एक समय
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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