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________________ गाथा ११६] चरित्तमोहणीय-उवसामणाए गाहासुत्तणिद्देसो (६३) उवसामणा कदिविधा उवसामो कस्स कस्स कम्मस्स । कं कम्मं उवसंतं अणउवसंतं च कं कम्मं ॥११६॥ ३. एसा पढमा गाहा उवसामणाभेदणिद्देसडमुवसामिजमाणकम्मविसेसावहारगडमुवसंताणुवसंतपय डिसरूवणिरूवणटुं च समागया । संपहि एदिम्से किंचि अवयवत्थपरामरसं कस्सामो। तं जहा–'उवसामणा कदिविधा' एवं भणिदे पसत्थापसत्थमेदेण दुविहा उवसामणा होदि त्ति एवंपयारो तब्भेदणिदेसो सूचिदो । 'उवसामो कस्स कस्स कम्मस्स' एदेण वि सव्वेसिं कम्मोणं किमेशा उ वसामणा संभवइ, आहो पत्थि त्ति पुच्छं कादण तदो सेसकम्पपरिहारेण मोहणीयविसये चेव पयदोवसामणासंभवो त्ति एवंविहा अत्थपरूवणा सूचिदा। 'कं कन्म उवसंतं' एदम्मि वि गाहापच्छद्धसुत्तावयवे णवंसय वेदादिपयडीणं जहाकममुवसामिजमाणाणं कदमम्मि अवत्थाविसेसे कं कम्ममुवसंतं होइ, कं वा अणुवसंतमिच्चेवंविहा अत्थपरूवणा पडिबद्धा । एवमेसा संखेवेण पढमगाहए अत्थपरूवणा । एदिस्से वित्थारस्थपरूवणमुवरि चुण्णिसुत्तसंबंधेणेव कस्सामो। (६४) कदिभागुवसामिजदि संकमणमुदीरणा च कदिभागो । कदिभागं वा बंधदि हिदि-अणुभागे पदेसग्गे ॥११७।। उपशामना कितने प्रकारकी होती है ? उपशम किस-किस कर्मका होता है ? कब कौन कर्म उपशान्त रहता है और कौन कर्म अनुपशान्त रहता है ॥११६॥ ६३. यह प्रथम गाथा उपशामनाके भेदोंका निर्देश करनेके लिये, उपशमको प्राप्त होनेवाले कर्मविशेषोंका निश्चय करनेके लिये तथा उपशान्त और अनुपशान्त प्रकृतियोंके स्वरूप का निरूपण करनेके लिये आई है। अब इसके किंचित् अवयवार्थका परामर्श करेंगे। वह जैसे-'उवसामणा कदिविधा' ऐसा कहने पर प्रशस्त और अप्रशस्तके भेदसे दो प्रकारको उपशामना होती है इस प्रकार उक्त प्रकारसे उसके भेदोंका निर्देश किया है। 'उवसामो कस्स कस्स कम्मस्स' इस वचन द्वारा भी सभी कर्मोंकी क्या यह उपशामना सम्भव है अथवा सम्भव नहीं है ऐसी पृच्छा करके पश्चात् शेषकर्मोके परिहारद्वारा मोहनीय कर्मके विषयमें ही प्रकृत उपशामना सम्भव है इस प्रकारकी अर्थप्ररूपणा सूचित की गई है। 'कं कम्मं कस्स उवसंत' गाथासूत्रके इस उत्तरार्धसम्बन्धी चरणमें भी क्रमसे उपशान्त होनेवाली नपुंसकवेद आदि प्रकृतियोंके किस अवस्था विशेषमें कौन कर्म उपशान्त होता है अथवा कौन कर्म अनुपशान्त रहता है इस प्रकारकी अर्थप्ररूपणा प्रलिबद्ध है। इस प्रकार संक्षेपसे प्रथम गाथाकी यह अर्थप्ररूपणा है । इसके विस्ताररूप अर्थकी प्ररूपणा आगे चूर्णिसूत्रके सम्बन्धसे ही करेंगे। ___चारित्रमोहकर्मकी स्थिति, अनुभाग और प्रदेशपुञ्जके कितने भागका प्रति समय उपशमन करता है, संक्रमण करता है और उदीरणा करता है तथा कितने भाग का बन्ध करता है ॥११७॥
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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