SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 230
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १८७ गाथा ११५] संजमट्ठाणाणं अप्पाबहुअं * वीयरायस्स अजहण्णमणुकस्सयं चरित्तलद्धिट्ठाणमणंतगुणं । ६३. कुदो ? खीणोवसंतकसाएसु केवलीसु च जहाक्खादविहारसुद्धिसंजमलद्धीए एत्थ विवक्खियत्तादो। एसा उवसंतकसायभयवंतये जहण्णा होदु, खीणकसायसजोगि-अजोगीसु च उकस्सिया होउ, खइयलद्धिपाहम्मादो त्ति णासंकणिज्जं, खीणोवसंतकसाएसु कसायाभावेण अवट्टिदसंजमपरिणामेसु जहाक्खादविहारसुद्धिसंजमस्स मेदाणुवलंभादो। एवमप्पाबहुए समत्ते तदो 'लद्धी तहा चरितत्तस्से त्ति समत्तमणिओगद्दारं । * उससे वीतरागका अजघन्य-अनुत्कृष्ट चारित्रलब्धिस्थान अनन्तगुणा है। ६६२. क्योंकि क्षीणकषाय, उपशान्तकषाय और केवलियोंमें जघन्य और उत्कृष्ट विशेषणसे रहित यथाख्यातविहारशुद्धि संयमलब्धिकी यहाँ पर विवक्षा है। - शंका-यह उपशान्तकषाय भगवन्तके जघन्य होओ तथा क्षीणकषाय, सयोगिकेवली और अयोगिकेवलीके क्षायिकलब्धिके माहात्म्यवश उत्कृष्ट होओ? समाधान-ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि क्षीणकषाय और उपशान्तकषाय जीवोंमें कषायोंका अभाव होनेसे अवस्थित संयम परिणाम होनेपर यथाख्यातविहार. . शुद्धिसंयममें भेद नहीं उपलब्ध होता। इस प्रकार अल्पबहुत्वके समाप्त होनेपर 'लद्धी तहा चरित्तस्स' के अनुसार संयमलब्धि अनुयोगद्वार समाप्त हुआ। १. ता. प्रती तहोव इति पाठ:
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy