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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ संजमलद्धी ६५९. कुदो ! पुव्विन्लजहण्णट्टाणादो असंखेज लोगमेत्तद्धाणमुवरि गंतूण सामाइयछेदोवडावणाणमपडिवादापडिवजमाणड्डाणाणमन्यंतरे समयाविरोहेणेदस्स समुप्पत्ति १८६ दंसणादो । * सामाइयछेदो वद्वावणियाणमुक्कस्सयं संजमट्ठाण मणंतगुणं । $ ६०. कुदो ? सामाइयच्छेदोवट्ठावणियाणमजहण्णाणुक्कस्सअपडिवादापडिवञ्जमाहाणेण समाणभावेण पुव्विल्लुकस्सट्ठाणे णिट्ठिदे तदो णिरंतरकमेण पुणो वि ततो उवरि असंखेअलोगमेत्ताणि छट्टाणाणि गंतूणेदस्स अणियट्टिखवग चरिमसमये समुप्पत्तिदंसणादो | * सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदस्स जहण्णयं संजमद्वाणमणंतगुणं । ६१. बादरकसायाणुवि धुकस्स संजमलद्धीदो सुहुमकसायाणुविज हण्णसंजमलडीए वि अनंतगुणसं मोनू पयारंतरासंभवादो । एदं पुण सुहुमसां पराइयस्स उवसामियस परिवदमाणयस्स चरिमसमये घेत्तव्वं । * तस्सेवकस्सचं संजमाणमर्णतगुणं । $ ६२. सुहुमसांपराइयक्खवगस्स चरिमसमये सब्बुकस्स विसोहिणिबंधणस्सेदस्स पुलिजहण परिणामादो अनंतगुणत्तसिद्धीए विरोहाभावादो । $५०. क्योंकि पहलेके जघन्य स्थानसे असंख्यात लोकप्रमाण स्थान ऊपर जाकर सामायिक छेदीपस्थापनासम्बन्धी अप्रतिपात अप्रतिपद्यमान स्थानोंके भीतर यथागम इस स्थानकी उत्पत्ति देखी जाती है। # उससे सामायिक-छेदोपस्थापना संयतोंका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुण है । $ ६०. क्योंकि सामायिक छेदोपस्थापनाके अजघन्य - अनुत्कृष्ट अप्रतिपात - अप्रतिपद्यमान स्थानके समान पूर्वके उत्कृष्ट स्थानका निर्देश करनेपर तत्पश्चात् निरन्तर क्रमसे फिर भी उससे ऊपर असंख्यात लोकप्रमाण पट्स्थान जाकर इस स्थानकी अनिवृत्तिकरण क्षपक के अन्तिम समय में उत्पत्ति देखी जाती है । * उससे सूक्ष्मसाम्परायिक संयतका जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणा है । $ ६१. बादर कषायके रहते हुए होनेवाली उत्कृष्ट संयमलब्धिसे सूक्ष्मकषायमें होनेबाली संयमलब्धि भी अनन्तगुणी होती है, इसके सिवाय वहाँ अन्य प्रकार सम्भव नहीं है । परन्तु यह जो उपशामक गिरकर सूक्ष्मसाम्परायमें आया है उसके अन्तिम समयकी लेनी चाहिए । * उससे उसीका उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है । ६ ६२. सूक्ष्मसाम्परायिक क्षपकके अन्तिम समयमें सर्वोत्कृष्ट विशुद्धिनिमित्तक इसके पहले के जघन्य परिणामसे अनन्तगुणे सिद्ध होनेमें बिरोधका अभाव है ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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