SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 200
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सिरि-जइवसहाइरियविरइय-चुण्णिसुत्तसमण्णिदं सिरि-भगवंतगुरणहरभडारोवइट्ठ कसायपाहुडं तस्स सिरि-वीरसेगाइरियविरइया टीका जयधवला तत्थ संजमे त्ति तेरसमं अणिओगद्दारं +: + संजमिदसयलकरणे णमंसिउं सव्वसंजदे वोच्छं । संजमसुद्धिणिमित्तं संजमलद्धि त्ति अणिओगं ॥१॥ * लद्धी तहा चरित्तस्से त्ति अणिओगद्दारे पुव्वं गमणिज्ज सुत्तं । - $ १. लद्धी तहा चरित्तस्से ति गाहासुत्तावयवबीजपदे णिलीणं जमणियोगद्दारं कसायपाहुडस्स पण्हारसण्हमत्थाहियाराणं मज्झे तेरसमं खओवसमियसंजमलद्धीए पहाणभावेण पडिबद्धं, अदो चेव संजमलद्धिसण्णिदं तमिदाणिं वत्तइस्सामो। तत्थ पुवमेव ताव गमणिजमणुगंतव्वं सुत्तं, सुत्तेण विणा तप्परूवणाए सुत्ताणुसारीणं तत्थापवुत्तिप्पसंगादो ति । तं पुण सुत्तमेत्थोवजोगी कदममिच्चासंकाए पुच्छावकमाह जिन्होंने समस्त करणोंको संयमित कर लिया है ऐसे सर्व संयतोंको नमस्कार कर संयमकी शुद्धिके निमित्त संयमलब्धि अनुयोगद्वारको कहूँगा ॥१॥ * चारित्रलब्धि अनुयोगद्वारमें पहले गाथासूत्र ज्ञातव्य है। $ १. गाथासूत्रके 'लद्धी तहा चरित्तस्स' इस अवयवरूप बीजपदमें कषायप्राभृतके पन्द्रह अर्थाधिकारोंके मध्य क्षायोपशामिक संयमलब्धिमें प्रधानरूपसे प्रतिबद्ध जो तेरहवाँ अनुयोगद्वार लीन है और इसीलिए जिसकी संयमलब्धि संज्ञा है उसे इस समय बतलाते हैं। उसमें सर्वप्रथम गाथासूत्र 'गमणिज्जं' जानने योग्य हैं, क्योंकि सूत्रके बिना उसकी प्ररूपणा करने पर सूत्रानुसारी शिष्योंकी उसमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। परन्तु यहाँ पर वह कौन सा सूत्र उपयोगी है ऐसी आशंका होने पर पृच्छावाक्यको कहते हैं
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy