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________________ । १६ ) कभी संख्यातगुणी हीन, कभी संख्यातवाँ भाग हीन और कभी असंख्यातवाँ भाग हीन होती है। यदि संक्लेशकी बहुलता वश यह जीव संयमासंयमसे च्युत होकर अन्तर्मुहूतकालमें या बहुत काल बाद पूर्व में प्राप्त तथावस्थित वेदकसम्यक्त्वके साथ संयमासंयमको प्राप्त करता है तो उसके पूर्ववत् उक्त दोनों करणपरिणाम पूर्वक ही उसकी प्राप्ति होती है और उसके स्थितिकाण्डकघात आदि वे सब कार्य भी होते हैं। ___ संयमासंयमगुणकी प्राप्ति तिर्य श्चोंके भी होती है और मनुष्योंके भी होती है। उसमें जो मिथ्यादृष्टि मनुष्य तत्प्रायोग्य विशुद्धि के द्वारा संययासंयमगुणको प्राप्त करते हैं उनके विशुद्धिरूप लब्धिस्थानसे जो मिथ्यादृष्टि तिर्यश्च तत्प्रायोग्य विशुद्धिके साथ संयमासंयमगुणको प्राप्त करते हैं उनका विशुद्धिरूप लब्धिस्थान अनन्तगुणा होता है। उससे जो असंयत न्यग्दृष्टि तिर्यश्च उत्कृष्ट विशद्धिके साथ संयमासंयमको प्राप्त करते हैं उनका वह लब्धिस्थान अनन्तगुणा होता है । उससे असंयत सम्यग्दृष्टि मनुष्य उत्कृष्ट विशुद्धिके साथ संयमासंयमगुणको प्राप्त करते हैं उनका वह लब्धिस्थान अनन्तगुणा होता है। इसीप्रकार प्रतिपात स्थानों अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमान स्थानोंके विषयमें भी मूलसे जान लेना चाहिए । मूलमें इस विषयका स्वतन्त्र विचार किया है। संयतासंयत जीव अनन्तानुबन्धी कषायका तो वेदन करता ही नहीं, क्योंकि सासादन गुणस्थानमें ही इनकी उदयव्युच्छित्ति हो जाती है। यह जीव अप्रत्याख्यान कषायका भी वेदन नहीं करता, क्योंकि इनकी उदयव्युच्छित्ति चौथे गुणस्थानमें ही हो जाती है। इसलिए संयमासंयमलब्धि औदयिक तो है नहीं। यद्यपि इसके प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, संज्वलनचतुष्क और नौ नोकषायोंका उदय पाया जाता है। परन्तु उनमेंसे प्रत्याख्यानावरणचतुष्क तो सकलसंयमके प्रतिबन्धक हैं। वे संयमासंयमगुणका प्रतिबन्ध नहीं करते। इसलिए इस अपेक्षासे भी संयमसंयमगुण औदयिक नहीं है। अब रहे चार संज्वलन और नौ नोकषाय सो ये देशघातिरूपसे उदीर्ण होते हैं, इस कारण संयमासंयमगुण देशघाति अर्थात् क्षायोपशमिक भावपनेको प्राप्त करता है। यहाँ यद्यपि क्षयोपशम कर्मका होता है पर कार्यमें कारणका उपचारकर इस गुणको भी क्षायोपशमिक कहा गया है। आशय यह है कि प्रकृतमें चार संज्वलन और नौ नोकषायोंके सर्वघाति स्पर्धकोंका उदयक्षय होनेसे और उन्हींके देशघाति स्पधकोंका उदय होनेसे संयमासंयमगुणकी प्राप्ति होती है, इसलिए संयमासंयमगुण क्षायोपशमिक सिद्ध होता है। ____ संयमासंयमलब्धि क्षायोपशमिक है इसकी सिद्धि इस प्रकार भी होती है कि संयतासंयत जीवके अप्रत्याख्यानावरणीयका तो उदय है नहीं। प्रत्याख्यानावरणीयका उदय होकर भी वह संयमासंयमगुणका न तो उपघात ही करता है और न अनुग्रह ही करता है, इसलिए प्रत्यख्यानावरणीयचतुष्कका वेदन करता हुआ यदि चार संज्वलन और नौ नोकषायोंका कुछ भी वेदन न करे तो संयमासंयमगुण क्षायिक भावके समान एकप्रकारका ही हो जावे । परन्तु यह सम्भव नहीं है, अतः चार संज्वलन और नौ नोकषायोंका देशघातिरूपसे वहाँ उदय स्वीकार कर लेना चाहिए और यतः चार संज्वलन और नौ नोकषायोंके असंख्यातलोकप्रमाण भेद हैं, अतः क्षयोपशमस्वरूप लब्धिके भी असंख्यात लोकप्रमाण भेद जान लेने चाहिए। इसप्रकार संयमासंयमलब्धिका संक्षेपमें विचार किया।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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