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________________ ( १५ ) एक स्थितिकाण्डकघातका काल जिस समय समाप्त होता है उसी समय उसके साथ होनेवाले स्थितिबन्धापसरणका काल भी समाप्त होता है। तथा इस एक स्थितिकाण्डकघात के कालके भीतर हजारों अनुभाग काण्डकघात होते हैं । उनमें से अन्तिम अनुभागकाण्डकघात भी उक्त दोनोंके साथ ही समाप्त होता है । इस प्रकार हजारों स्थितिकाण्डकघातों, हजारों बन्धापसरणों और एक-एक स्थितिकाण्डकघात के भीतर हजारों अनुभागकाण्डकघातोंके होनेपर अपूर्वकरणका काल समाप्त होकर तदनन्तर समयमें संयतासंयत हो जाता है । यह भाव संयतासंयतका स्वरूप है, द्रव्यसंयतासंयत तो पहले से ही था । किन्तु इसके बिना उसको पालन करनेवाला जीव यथार्थ में संयतासंयत कहलानेका अधिकारी नहीं था । इसके पहले वह भावसे असंयत ही था । इसलिए भावों की अपेक्षा यहाँ वह असंयमरूप पर्यायको छोड़कर संयमासंयमरूप पर्यायको प्राप्त करता है । इस प्रकार जिस समय यह जीव संयमासंयमको प्राप्त करता है उसके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त काल तक इसके परिणामों में प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धि होती रहती है । इसलिए इस विशुद्धिको एकान्तानुवृद्धिरूप विशुद्धि कहते हैं । यद्यपि यह विशुद्धि करणस्वरूप नहीं है फिर भी इसके माहात्म्य वश अपूर्व स्थितिकाण्डकघात, अपूर्व अनुभागकाण्डकघात और अपूर्व स्थितिबन्धको यह जीव प्रारम्भ करता है। तथा असंख्यात समयप्रबन्धों का अपकर्षणकर उदयावलि बाह्यगुणश्रेणि रचना भी करता है । आशय यह है कि संयमासंयमको प्राप्त करनेके प्रथम समयमें ही उपरिम स्थितिमें स्थित द्रव्यका अपकर्षणकर गुणश्रेणनिक्षेप करता हुआ उदयावलिके भीतर असंख्यात लोकसे भाजित लब्ध द्रव्यको गोपुच्छाकारसे निक्षिप्तकर उदद्यावलिके बाहर अनन्तर स्थिति में असंख्यात समयप्रकद्धोंका निक्षेप करता है । इसप्रकार गुणश्रेणि झीर्षतक उत्तरोत्तर प्रत्येक स्थिति में असंख्यातगुणे द्रव्यका निक्षेपकर उससे उपरिम स्थिति में असंख्यातगुणे हीन द्रव्यका निक्षेप करता है । उसके बाद प्रत्येक स्थितिमें उत्तरोत्तर विशेष हीन द्रव्यका निक्षेप करता है । यहाँ यह अवस्थित गुणश्रेणि है, इसलिए द्वितीयादि समयों में उतना ही गुणश्रेणि निक्षेप होता है । इसप्रकार बहुत स्थितिकाण्डकघात आदिके साथ एकान्तानुवृद्धि संयतासंयतकाल समाप्त होनेपर यह जीव अधःप्रवृत्त संयतासंयत हो जाता है । यहाँसे इसकी स्वस्थान विशुद्धिका प्रारम्भ हो जाता है । इसके स्थितिघात और अनुभागघात ये कार्य नहीं होते। ऐसा जीव कुछ काल तक संयमासंयमका पालनकर तीव्र विराधनाकी कारणभूत बाह्य सामग्रीके बिना केवल तत्प्रायोग्य संक्लेश परिणाम होनेपर संयमासंयमसे च्युत होकर असंयमभावको भी प्राप्त हो जाता है । यह तत्प्रायोग्य विशुद्धिके साथ मन्द संवेगरूप परिणामके द्वारा स्थिति और अनुभाग में वृद्धि किये विना जीवादि पदार्थों को यथावत् स्वीकार करता हुआ शीघ्र ही संयम संयमको भी प्राप्त हो सकता है। इसके करणपरिणाम न होनेसे स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात आदि कार्य नहीं होते । विशेषता है कि संयतासंयतके निमित्तसे गुणश्रेणिनिर्जरा के सतत होते रहनेका नियम है, इसलिए संयतासंयत के गुणश्रेणि निर्जराका जधन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम एक पूर्व कोटिप्रमाण है । इतना अवश्य है कि यह गुणश्रेणिनिर्जरा यथासम्भव विशुद्धि और संक्लेशके अनुसार न्यूनाधिक होती रहती है। विशुद्धि के अनुसार प्रत्येक समय में पूर्व समयकी अपेक्षा कभी असंख्यातगुणी, कभी संख्यातगुणी, कभी संख्यातवाँ भाग अधिक और कभी असंख्यातवाँ भाग अधिक होती है । तथा संक्लेशके अनुसार कभी असंख्यातगुणी हीन,
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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