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________________ १३२ जयधवलासहिदे कसाय पाहुडे [ संजमा संजमलद्धी संजमं पडिवजमाणस्स एदाणि चैवाणंतरणिद्दिट्ठाणि दोण्णि करणाणि कादव्वाणि भवति, अण्णा आगुंजावसेण वड्डाविद डिदि - अणुभागाणं घादाणुववत्तदो । ४९. एवमेत्तिएण पबंघेण संजमा संजमलद्धीए परूवणं समाणिय संपहि पयदत्थविसयपदविसेसपडिबद्धमप्पा बहुअदंडयं पदपरिवृरणबीजपदावलंबणेण परूवेमाणो तव्वियमेव पण्णावकमाह- * तदो एदिस्से परूवणाए समत्ताए संजमासंजमं पडिवजमाणगस्स पढमसमयअपुग्वकरणादो जाव संजदासंजदो एयंताणुवडीए चरित्ता - चरितलद्धीए वढदि, एदम्हि काले ट्ठिदिबंध -ट्ठिदिसंतकम्म-ट्ठिदिखंडयाणं जहण्णुक्कस्सयाणमाबाहाणं जहण्णुक्कस्सियाणमुक्कीरणद्धाणं जहण्णुक्कस्सियाणं अरसिं च पदाणमप्पाबहुअं वत्तइस्सामो । $ ५०. सुगममेदं पइण्णावकं । णवरि एत्थ चरित्ताचरित्तलद्धीए वित्ते संजमा संजमलद्धीए चेव पज्जायणिद्देसो एसो त्ति गहियव्वो; देसचरितलद्धीए कासे विशुद्धिको पूर कर संयमासंयमको प्राप्त होता है, संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले उस जीवके ये अनन्तर पूर्व निर्दिष्ट किये गये दो करण करणीय होते हैं, अन्यथा आगुंजावश बढ़ाई गई स्थिति और अनुभागका घात नहीं बन सकता । विशेषार्थ - यहाँपर जो संयतासंयत अत्यन्त संक्लेश परिणामोंके कारण संयमासंयम गुणसे च्युत होकर मिथ्यात्व गुणस्थानको प्राप्त हुआ है वह यदि अन्तर्मुहूर्तकाल में या वेदक प्रायोग्य कालके भीतर दीर्घ कालके बाद पुनः संयमासंयमको प्राप्त करता है तो अधःप्रवृत्तकरण और अपूर्वकरण करके ही वह इस गुणको प्राप्त कर सकता है, अन्य प्रकारसे नहीं यह स्पष्टीकरण यहाँपर किया गया है। ४९. इस प्रकार इतने प्रबन्धद्वारा संयमासंयमलब्धिका कथन समाप्त करके अब प्रकृत अर्थविषयक पदविशेषोंसे सम्बन्ध रखनेवाले अल्पबहुत्वदण्डकका पदपूर्तिरूप बीजपदोंका अवलम्बन लेकर कथन करते हुए तद्विषयक ही प्रतिज्ञावाक्यको कहते हैं- * पश्चात् इस प्ररूपणा के समाप्त होनेपर संयमासंयमको प्राप्त होनेवाले जीवके अपूर्वकरणके प्रथम समय से लेकर एकान्तानुवृद्धिरूप विशुद्धिके निमित्तसे चरित्ताचरित्तलब्धि अर्थात् संयमासंयमलब्धिकी वृद्धि होने तक इस कालके भीतर जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिबन्ध, स्थितिसत्कर्म और स्थितिकाण्डकोंका, जघन्य और उत्कृष्ट आबाधाओंका जघन्य और उत्कृष्ट उत्कीरणकालोंका तथा अन्य पदोंका अल्पबहुत्व बतलावेंगे । $ ५०. यह प्रतिज्ञावाक्य सुगम है । इतनी विशेषता है कि यहाँपर चरिताचरित्तलब्धि ऐसा कहनेपर संयमासंयमलब्धिका ही यह पर्यायनिर्देश है ऐसा ग्रहण करना चाहिए,
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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