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________________ गाथा ११५] एत्थतणगाहावयवत्थपरूवणा ७. अधवा 'लद्धी य संजमासंजमस्से' त्ति वुत्ते संजमासंजमलद्धी अणेयमेयभिण्णा घेत्तव्वा । तं जहा, तिविहाणि संजमासंजमलद्धिट्ठाणाणि-पडिवादट्ठाणाणि पडिवजमाणट्ठाणाणि अपडिवादअपडिवजमाणट्ठाणाणि चेदि । एवं संजमलद्धीए वि तिविहत्तं वत्तव्वं । तदो गाहापुव्वद्धे संजमासंजम-संजमलद्धिट्ठाणाणं' परूवणा णिबद्धा त्ति घेत्तव्वं । 'वड्ढावड्डी' इच्चेदस्स बीजपदस्स अत्थो पुव्वं व वत्तव्यो । अहवा 'वड्डि' त्ति वुत्ते संजमासंजमं संजमं च पडिवजमाणस्स एयंताणुवडिपरिणामं पुव्वं व घेत्तण तदो 'अवड्डि' त्ति एदेण ओवड्डी गहेयव्या । का ओवड्डी णाम ? संजमासंजम-संजमलद्धीहितो हेट्ठा पडिवदमाणयस्स संकिलेसवसेण पडिसमयसम्यग्दर्शनादि स्वभावभावोंको स्वप्रत्यय कहनेका यही कारण है। यतः सम्यग्दर्शनादिकी प्राप्तिके समय आत्माका उपयोग अपने स्वरूप में ही युक्त रहता है अतः मानना पड़ता है कि एक सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिके समय उसके साथ अंशरूपमें सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकी भी प्राप्ति होती है। यतः उस समय आत्माका उपयोग अपने स्वरूपको ही वेदता है, अतः जब भी सम्यग्दर्शनकी उत्पत्ति होती है तब वह स्वानुभूतिके साथ ही होती है। स्वानुभूतिको सम्यग्दर्शनका लक्षण स्वीकार करनेका भी यही कारण है और यह स्वानुभूति स्वोपयुक्त रत्नत्रय परिणाम या तत्परिणत आत्मा है, अतः ऐसे जीवके दर्शनमोहनीयत्रिकके उदयाभावरूप करणोपशम आदिके साथ अनन्तानुबन्धीचतुष्कका भी अनुदयरूप उपशम आदि स्वीकार किया गया है । जिस चारित्रकी संज्ञा संयमासंयम और संयम है उसकी प्राप्ति भले ही मात्र अनन्तानुबन्धीके उदयाभावमें न हो, पर उक्त विवेचनसे यह स्पष्ट है कि दर्शनमोहनीयत्रिकके उपशम होनेके साथ अनन्तानुबन्धीका उदयाभाव होने पर स्वरूपरमणतारूप आत्मपरिणामकी प्राप्ति नियमसे होती है। यही कारण है कि सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिके समय जिस प्रकार दर्शनमोहनीयत्रिकका उदयाभाव नियमसे होता है उसी प्रकार अनन्तानुबन्धीचतुष्कका भी उदयाभाव अवश्य होता है। अतः विवक्षावश अनन्तानुबन्धीचतुष्कको सम्यग्दर्शनका प्रतिबन्धक भी कहा गया है पर है वह चारित्रमोहनीयका अवान्तर भेद ही। ६७. अथवा 'लद्धी य संजमासंजमस्स' ऐसा कहनेपर संयमासंयम लब्धिको अनेक प्रकारको ग्रहण करनी चाहिए। यथा-संयमासंयमलब्धिस्थान तीन प्रकारके हैं-प्रतिपातस्थान, प्रतिपद्यमानस्थान और अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थान । इसीप्रकार संयमलब्धिके भी तीन प्रकारके स्थान कहने चाहिए। इसलिए गाथाके पूर्वाधमें संयमासंयम और संयम लब्धिस्थानोंकी प्ररूपणा निबद्ध है ऐसा ग्रहण करना चाहिए । 'वडावड्डी' इस बीजपदका अर्थ पहलेके समान कहना चाहिए। अथवा 'वड्ढी' ऐसा कहनेपर संयमासंयम और संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके एकान्तानुवृद्धिपरिणामका पहलेके समान ग्रहणकर उसके बाद 'अवड्ढि' इस पदद्वारा 'ओवड्ढी' अर्थात् उत्तरोत्तर परिणामहानि ग्रहण करनी चाहिए। शंका-'अववृद्धि' किसे कहते हैं ? १. ता०प्रतौ संजमासंजमलद्धिठाणाणं इति पाठः । २. ता०प्रती 'अवट्ठि' इति पाठः । ३. ता०प्रती ओवड्ढि इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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