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________________ ८१ गाथा ११४ ] कदकरणिजस्स कज्जविसेसपरूवणा वेव एत्तो पाए णिट्ठिदकिरियस्सेदस्स कदकरणिज्जभावपदुप्पायणट्टमुत्तरसुत्तमोइण्णं । * चरिमे हिदिखंडए णिट्ठिदे कदकरणिज्जो त्ति भण्णदे। $ १०४. कुदो ? कदासेसकरणिज्जत्तादो। ण च एत्तो उवरि दंसणमोहक्खवणविसयं किंचि करणिज्जमत्थि, तहाणुवलंभादो । तम्हा चरिमे द्विदिखंडए णिद्विदे तदो पहुडि जाव सम्मत्तस्स अंतोमुहुत्तमेत्तगुणसेढिगोबुच्छाओ कमेण गालेइ ताव कदकरणिज्जववएसारिहो एसो त्ति सिद्धं । एदस्स च सगकालभंतरे जो संभवंतओ परूवणाविसेसो तण्णिण्णयकरणमुत्तरो सुत्तपबंधो * ताधे मरणं णि होज । 5 १०५. तदद्धाए पढमसमयप्पहुडि जाव चरिमसमयो त्ति जत्थ वा तत्थ वा वट्टमाणस्स भवक्खयवसेण मरणं पि सिया हवेज्ज, दसणमोहक्खवगस्स अमरणपइण्णाए अणियट्टिकरणचरिमसमयपज्जंतत्तादो । * लेस्सापरिणाम पि परिणामेज । $१०६. एसो कदकरणिज्जो पुव्वं व वड्डमाणसहतिलेस्साणमण्णदराए लेस्साए परिणदो होदणागदो एण्हि लेस्संतरं पि परिणामे, लहदि त्ति भणिदं होदि । होते और इसीलिए यहाँसे आगे निष्ठितक्रियावाले इसके कृतकृत्यभावके कथन करनेके लिये आगेका सूत्र आया है * अन्तिम स्थितिकाण्डकके समाप्त होनेपर यह जीव कृतकृत्य कहा जाता है। ६१०४. क्योंकि इसने समस्त करणीय कर लिया है। इससे ऊपर दर्शनमोहनीयकी क्षपणाविषयक कुछ भी करणीय नहीं है, क्योंकि वैसा कुछ करणीय पाया नहीं जाता। इसलिये अन्तिम स्थितिकाण्डकके समाप्त होनेपर वहाँसे लेकर सम्यक्त्वकी अन्तमुहूर्तप्रमाण गुणश्रेणि-गोपुच्छाओंके क्रमसे गलानेके समय तक यह कृतकृत्य इस संज्ञाके योग्य है यह सिद्ध हुआ और इसके अपने कालके भीतर जो प्ररूपणाविशेष सम्भव है उसका निर्णय करनेके लिये आगेका सूत्रप्रवन्ध * उस कालमें मरण भी हो सकता है । $ १०५. उस कालके भीतर प्रथम समयसे लेकर अन्तिम समय तक जहाँ कहीं विद्यमान जीवका भबके क्षयवश मरण भी स्यात् हो सकता है, क्योंकि दर्शनमोहके क्षपकके नहीं मरनेकी प्रतिज्ञा अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समय तक ही है । * लेश्यापरिणामको भी परिणमा सकता है। $ १०६. यह कृतकृत्य जीव पहलेसे वर्तमान शुभ तीन लेश्याओं में से अन्यतर लेश्यासे परिणत होकर आया है। किन्तु इस समय दूसरी लेश्याके परिणामको भी प्राप्त १. ता० प्रती 'तदद्धाए पढमसमयप्पहुडि जाव चरिमग्रमओ त्ति' इत्यपि सूत्रत्वेन निर्दिष्टम् ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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