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________________ जयधवलास हिदे कसायपाहुडे [ दंसणमोहक्खवणा हिदीस जं पदेसग्गमुदए दिज्जदि तं थोवं । से काले असंखेज्जगुणं तावजाव' द्विदिखंडयस्स जहण्णियाए द्विदीए चरिमसमय- अपत्तो त्ति । ७४ $ ९७, एत्थ ‘ओवट्टिजमाणासु द्विदीसु' त्ति वृत्ते जाओ ट्ठिदीओ ट्ठिदिखंडय - सरूवेण अच्छिदाओ तासि गहणं कायव्वं । अधवा सव्वासिमेव सम्मत्तस्स उदयावलियबाहिरट्टिदीणं गहणं कायव्वं । तदो तासु द्विदीसु जं पदेसग्गं तमोकड्डियूण गुणसे दणिक्खेवं कुणमाणो उदए थोवं पदेसग्गं देदि । कुदो ? उदयादिगुणसेटिपइण्णाए अट्ठवस्सट्ठिदिसंतकम्मप्पहुडि पयट्टमाणाए पडिघादाभावादो । तदणंतरोवरमी असंखेज्जगुणं पदेसग्गं दिज्जदि । को गुणगारो ? तप्पा ओग्गपलिदोवमासंखेज्जभागमेत्तरूवाणि । एवं ताव असंखेज्जगुणं जाव ट्ठिदिखंडयस्स जहणियाए द्विदीए चरिमसमय- अपत्तो' ति । एत्थ 'ट्ठिदिखंडयस्स जहण्णिया ट्ठिदित्ति भणिदे द्विदिखंडयस्स आदिट्ठिदी घेत्तव्वा । तिस्से उद्देसं 'चरिमसमय- अपत्तो' ति वृत्ते तदनंतरहेट्ठिमणिसेयट्ठिदिं पज्जत्तं काढूण असंखेज्जगुणसेढीए पदेसविण्णासं करेदित्ति घेत्तव्वं । अहवा ट्ठिदिखंडयजहण्णट्ठिदीए चरिमसमयमपत्तो त्ति वृत्ते पर अपवर्तन की जानेवाली स्थितियोंमेंसे जो प्रदेशपुञ्ज उदयमें दिया जाता है वह अल्प है । अनन्तर समय में अर्थात् तदनन्तर उपरिम स्थिति में असंख्यातगुणे प्रदेश - पुञ्जको देता है । इसप्रकार तब तक देता है जब तक कि जघन्य स्थितिका अन्तिम समय नहीं प्राप्त होता । $ ९७. इस सूत्र में 'ओवट्टिज्ज माणासु द्विदीसु' ऐसा कहने पर जो स्थितियां स्थितिकाण्डकरूपसे अवस्थित हैं उनका ग्रहण करना चाहिए । अथवा सम्यक्त्वकी उदद्यावलि बाह्य सभी स्थितियोंका ग्रहण करना चाहिए । अतः उन स्थितियोंमें जो प्रदेशपुञ्ज है उसका अपकर्षण कर गुणश्रेणिमें निक्षेप करता हुआ उदयमें अल्प प्रदेशपुञ्जको देता है, क्योंकि आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्मसे लेकर उदयादि गुणश्र णिकी प्रतिज्ञाके प्रवृतमान होने में कोई रुकावट नहीं पाई जाती । पुन तदनन्तर उपरिम स्थिति में असंख्यातगुणे प्रदेशपुञ्जको देता है । गुणकार क्या है ? तत्प्रायोग्य पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण अंक गुणकार है। इस प्रकार तब तक असंख्यातगुणे प्रदेशपुञ्जको देता है जब तक स्थितिकाण्डककी जघन्य स्थिति का अन्तिम समय नहीं प्राप्त होता । यहाँ सूत्र में 'स्थितिकाण्डककी जघन्य स्थिति' ऐसा कहने पर स्थितिकाण्डककी आदि अर्थात् प्रथम स्थिति ग्रहण करनी चाहिए। उसके उद्देश से 'चरिमसमय- अपत्तो' ऐसा कहने पर तदनन्तर अधस्तन निषेकस्थिति तक असंख्यातगुणित श्र ेणिरूपसे प्रदेशविन्यास करता है ऐसा ग्रहण करना चाहिए । अथवा 'ट्ठिदिखंडयजहण्ण १. ता० प्रती ताव असंखेज्जगुणं जाव इति पाठः । २. ता० प्रतौ चरिमसमयमपत्तो इति पाठः । ३. ताप्रती अ (म ) पत्तो इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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