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________________ गाथा ११४] अणियट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा ७३ णियट्टिकरणद्धाहितो विसेसाहियभावेण णिसित्तपोराणगुणसेढिसीसयस्स वि उवरिमे भागे अंतोमुहुत्तमेत्तहिदीओ घेत्तूण चरिमट्ठिदिखंडयमागाएदि त्ति एसो एदस्स भावत्थो। अवट्ठिदगुणसेढिअद्धाणे वि केत्तियं पि उव्वराविय सेससंखेज्जे भागे आगाएदि ति वक्खाणिजमाणे को दोसो ति चे? ण, कदकरणिज्जगोवुच्छाणं पंलिदोवमासंखेजभागगुणगारोवएसेण सुत्तसिद्धेण तहाब्भुवगमस्स वाहियत्तादो। गलिदसेसगुणसेढिसीसयादो प्पहुडि हेट्ठिमभागं सव्वमेव कदकरणिजद्धासरूवेण ठवेदि त्ति किण्ण वक्खाणिज्जदे ? ण, तहाविहपुयाइरियसंपदायविसेसाभावादो । ६९६. एवं चरिमट्ठिदिखंडयमाढविय अंतोमुहुत्तकालेण पिल्लेवेमाणस्स तकालभंतरे गुणसेढिणिक्खेवगयविसेसं परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ___* सम्मत्तस्स चरिमहिदिखंडए पढमसमयमागाइदे ओवट्टिन्जमाणासु अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके कालसे विशेष अधिकरूपसे रचित पुराने गुणश्रेणिशीर्षके उपरिम भागमें अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितियोंको ग्रहण कर अन्तिम स्थितिकाण्डकको घातके लिये प्रहण करता है यह इस सूत्रका भावार्थ है । शंका-अवस्थित गुणश्रेणि-अध्वानमें भी कितने ही भागको छोड़कर शेष संख्यात बहुभागको ग्रहण करता है ऐसा व्याख्यान करनेमें क्या दोष है ? समाधान नहीं, क्योंकि कदकरणीयकी गोपुच्छाओंका उक्त प्रकारसे स्वीकार पल्योपमके असंख्यातवें भागरूप सूत्रसिद्ध गुणकारके उपदेशसे बाह्य है। शंका गलित शेष गुणश्रेणिशीर्षसे लेकर अधस्तन समस्त भागको कृतकरणीयके कालरूपसे स्थापित करता है ऐसा व्याख्यान क्यों नहीं किया जाता है ? समाधान नहीं, क्योंकि उस प्रकारका व्याख्यान करनेवाले पूर्वाचार्यसम्प्रदाय विशेषका अभाव है। विशेषार्थ-यहाँ सम्यक्त्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकका प्रमाण कितना है यह स्पष्ट करके बतलाया गया है कि पुराने गुणश्रेणिशीर्षकी उपरिम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितियोंसे लेकर शेष सब उपरिम स्थितिको घातके लिए अन्तिम स्थितिकाण्डकरूपसे ग्रहण करता है यह उक्त कथन का तात्पर्य है। ६९६. इस प्रकार अन्तिम स्थितिकाण्डकका आरम्भ कर अन्तमुहूर्तप्रमाण कालद्वारा निर्लेपन करनेवाले जीवके उस कालके भीतर गुणश्रेणिनिक्षेपगत विशेषताका कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * सम्यक्त्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकके प्रथम समयमें घातके लिए ग्रहण करने १०
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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