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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ दंसणमोहक्खवणा दिवड्ढगुणहाणिगुणिदसमयपबद्धस्स अंतोमुहुत्तोवट्टिदअट्ठवसायामो भागहारत्तेण ठवेयत्रो । एवं विदे पढमट्ठिदिखंडयचरिमफालिदव्यमागच्छछ । पुणो एदस्सा संखेजदिभागमेत्तमेव हेट्ठा गुणसेढीए णिक्खिविय सेसबहुभागे अवट्ठिदगुणसेढिसीसयप्पहुडि अंतोमुहुत्तूणट्टवस्से गोधुच्छायारेण णिसिंचदि ति अंतोमुहुत्तूणट्टवस्सेहिं एदम्मि खंडयदव्वे ओवट्टिदे णिरुद्धसमयम्मि अवदिगुण से ढिसीसयम्मि णिवदमाणदव्वं पुल्लितत्तणसंचयस्स समणंतरगुणसेढिहेड्डिमसीसयस्स च संखेज्जदिभागमेत्तमागच्छदि । तदो सिद्धं तदवस्थाए दुचरिमगुणसेढिसीसयादो चरिमगुणसेढिसीसयदवं संभागुत्तरं होण दीसह त्ति । एवमुवरि वि सव्वत्थ णेयव्वं जाव दुचरिमडिदिखंडय चरिमफालि त्ति, रूवूणट्टि दिखंडयुक्कीरणद्धामेत्तकालमसंखेज्जभागुत्तरं खंडयचरिमसमए च संखेज्जभागुत्तरं गुणसेढिसीसयम्मि दीसमाणदव्वं होइ त्ति एदेण भेदाणुवभादो | संपहि दुरिमट्ठिदिखंडय चरिमफालिपज्जंतो चैव एसो परूवणापबंधो । उवरि चरिमट्ठिदिखंडए आगाइदे पुध परूवणा होदि त्ति जाणावेमाणो उत्तरं सुत्ता वयवमाह ७० * एवं जाव दुचरिमट्ठिदिखंडयं ति । $ ९१. एवमेसा अणंतरपरूविदा गुणगारपरावत्ती ताव णेदव्वा जाव दुचरिमसमय काण्डक द्रव्यको लाना चाहते हैं, इसलिये डेढ़ गुणहानिगुणित समयप्रबद्ध के अन्तर्मुहूर्त भाजित आठ वर्षप्रमाण आयामको भागहाररूपसे स्थापित करना चाहिए। इस प्रकार स्थापित करनेपर प्रथम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिका द्रव्य आता है । पुनः इसके असंख्यातवें भागप्रमाण द्रव्यको ही नीचे गुणश्रेणिमें निक्षिप्तकर शेष बहुभागप्रमाण द्रव्यको अवस्थित गुण णिशीर्षसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्षोंमें गोपुच्छाकाररूपसे सींचता है, इसलिये अन्तर्मुहूर्तकम आठ वर्षोंके द्वारा इस काण्डकद्रव्यके भाजित करनेपर विवक्षित समय के अवस्थित गुणश्र णिशीर्ष में पतित होनेवाला द्रव्य वहाँ सम्बन्धी पूर्वके संचयके समनन्तर अधस्तन गुणश्र णिशीर्षके संख्यातवां भाग आता है। इसलिये सिद्ध हुआ कि उस अवस्थामें द्विचरम गुणश्र णिशीर्ष से अन्तिम गुणश्र ेणिशीर्षका द्रव्य संख्यातवाँ भाग अधिक होकर दिखाई देता है । इसी प्रकार ऊपर भी सर्वत्र द्विचरम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिके प्राप्त होने तक ले जाना चाहिए, क्योंकि एक कम स्थितिकाण्डकके उत्कीरणकालप्रमाण कालतक असंख्यातवाँ भाग अधिक और काण्डकके अन्तिम समय में संख्यातवाँ भाग अधिक गुणश्रेणिशीर्ष में दृश्यमान द्रव्य होता है इस प्रकार इस कथन के साथ पूर्वोक्त कथनका कोई भेद नहीं पाया जाता है। इस प्रकार द्विचरम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिपर्यन्त ही यह प्ररूपणाप्रबन्ध है । अब ऊपर के अन्तिम स्थितिकाण्डकके ग्रहण करनेपर भिन्न प्ररूपणा होती है इस बातका ज्ञान कराते हुए आगे के सूत्रावयवको कहते हैं * इस प्रकार यह क्रम द्विचरम स्थितिकाण्डक तक जानना चाहिए । $ ९१. इसप्रकार यह अनन्तर कहा गया गुणकारपरावर्तन द्विचरमस्थितिकाण्डक
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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