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________________ गाथा ११४ ] अणियट्टिकरणे कज्जविसेसपरूवणा हेट्ठिमसमयगुणसेढिसीसयं पत्तो त्ति । पुणो एदम्हादो उवरिमाणंतराए वि एकिस्से द्विदीए पदेसग्गमसंखेज्जगुणं णिसिंचदि । किं कारणं ? अवट्ठिदगुणसेढिणिक्खेवे कयपइण्णत्तादो। एण्हिमोकड्डिददव्वस्स बहुभागे अंतोमुहुत्तणहवस्सेहिं खंडिय तत्थेयखंडमेत्तदव्वं विसेसाहियं कादण संपहियगणसेढिसीसये णिक्खिवदि त्ति वुत्तं होइ । एत्तो उवरि सव्वत्थ विसेसहीणं चेव गिसिंचदि जाव चरिमट्ठिदिमइच्छावणावलियमेत्तेण अपत्तो त्ति । एवमट्ठवस्सविदिसंतकम्मियस्स पढमसमए दिजमाणस्स परूवणा कया। ____ ८९. संपहि तत्थेव दिस्समाणदव्वं कधमवचिट्ठदि ति एदस्स णिण्णयं वत्तइस्सामो । तं जहा-पुग्विल्लगुणसेढिसीसयादो संपहियगुणसेढिसीसयमसंखेज्जगुणं ण होइ । किं कारणमिदि १ भण्णदे'-संपहि ओकड्डियूण गहिदसव्वदव्वं पि मिलियूण प्राप्त होने तक असंख्यात गुणितक्रमसे सिंचन करता है। पुनः इससे उपरिम अनन्तर एक स्थितिमें भी असंख्यातगुणे प्रदेशपुञ्जका सिंचन करता है, क्योंकि यहाँ अवस्थित गुणश्रेणि निक्षेपकी प्रतिज्ञा की गई है। इस समय अपकर्षित हुए द्रव्यके बहुभागको अन्तर्मुहूर्तकम आठ वर्षों के द्वारा भाजित कर वहाँ जो एक भागप्रमाण द्रव्य प्राप्त हो, विशेष अधिक करके उसे इस समयके गुणश्रेणिशीष में निक्षिप्त करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इससे ऊपर सर्वत्र अतिस्थापनावलिमात्रसे अन्तिम स्थितिको नहीं प्राप्त होनेतक विशेषहीन-विशेषहीन द्रव्यका सिंचन करता है । इसप्रकार आठ वर्षके स्थितिसत्कर्मवाले जीवके प्रथम समयमें दीयमान द्रव्यकी प्ररूपणा की। विशेषार्थ—यहाँ जिस समय यह जीव सम्यक्त्वके स्थितिसत्कर्मको अपकर्षणकर आठ वर्षप्रमाण करता है उसके अनन्तर समयमें अपकर्षित द्रव्यका गुणश्रेणिमें और उससे तियोंमें निक्षेप किस प्रकारसे होता है इस बातको स्पष्ट करके बतलाया गया है। इस विषयमें पहली बात तो यह है कि सम्यक्त्वका आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म रहनेके पूर्व स्थितिकाण्डक पल्योपमका असंख्यातवें भागप्रमाण था। किन्तु अब उसका प्रमाण अन्तर्मुहू. है। दूसरी बात यह है कि सम्यक्त्वका आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म रहनेके समयसे लेकर उदयावलि बाह्य गलित शेष गुणश्रेणि न होकर उदयादि अवस्थित गुणश्रेणि चालू हो गई है, इसलिए प्रत्येक समयमें जहाँ एक समय प्रमाण अधःस्थितिका गलन होता है वहाँ ऊपर गुणश्रेणिमें एक समयका और योग होकर नया गुणश्रेणिशीर्ष स्थापित हो जाता है और इसप्रकार गुणश्रेणिके अधःस्तन समयसे लेकर ऊपर प्रत्येक समयमें उत्तरोत्तर जो असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे अपकर्षित द्रव्यका निक्षेप होता है उसी क्रमसे वह द्रव्य इस तत्काल स्थापित नवीन गुणश्रेणिशीर्षको भी मिलता है । शेष सब कथन स्पष्ट ही है। ६८९. अब वहीं पर दृश्यमान द्रव्य किस प्रकार अवस्थित रहता है इसका निर्णय करेंगे। यथा-पहलेके गुणश्रेणिशीर्षसे इस समयका गुणश्रेणिशीर्ष असंख्यातगुणा नहीं होता है। १. ता०प्रती -गुणं होइ । किं कारणमिदि भणिदे इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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