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________________ जयधबलास हिदे कसायपाहुडे [ दंसणमोहक्खवणा दिजमाणदव्वं ठिदि पडि पुन्धावष्टिददव्वादो असंखेजगुणं चेव होइ, चरिमफालिGoreम्मादोति त्व्वं । एवं दिण्णे उदयादो पहुडि जाव गुणसेटिसीसयं ताव दीसमाणदव्वमसंखेज्जगुणाए सेढीए चिट्ठदि । तदो उवरि सव्वत्थ अडवस्समेत्तट्ठिदिसंतकम्मस्सुवरि एयगोबुच्छायारेणावचिट्टदे । दिज्जमाणमिदि भणिदे सव्वत्थ तकालमोट्टियूण णिसिंचमाणदव्वं घेत्तव्वं । दीसमाणमिदि भणिदे चिराणसंतकम्मेण सह सव्वदव्वसमूहो घेत्तव्वो । एसो दिज्जमाण- दीसमाणाणमत्थो सव्वत्थ जोजेयव्वो । एवं सम्मामिच्छत्तचरिमफालिपदणा वत्थाए दिज्जमाण - दिस्समाणपरूवणा कया । ६६ 1 ९८८. पुणो से काले सम्मत्तस्स अंतोमुहुत्तमेत्तायामेण द्विदिखंडयं घेत्तूण गुणसेटिं करेमाणस्स गुणगारपरावत्तिं वत्तइस्साम । तं जहा - ता पाए अंतोमुहुत्तडिदिग्खंडय घादेणोवद्विजमाणासु सम्मत्तद्विदीसु जं पदेसग्गं तं ओकड्डणभागहार पडिभागेण घेत्तण उदयादिगुणसेढिणिक्खेवं करेमाणो उदये थोवं पदेसग्गं देदि । से काले असंखेज्जगुणं देदि । एवमणेण कमेणासंखेज्जगुणं णिसिंचमाणो गच्छड़ जाव वर्षप्रमाण सब गोपुच्छोंके ऊपर इस समय दिया जानेवाला द्रव्य प्रत्येक स्थितिके प्रति पूर्वके अवस्थित द्रव्यसे अन्तिम फालिके द्रव्यके माहात्म्यवश असंख्यातगुणा ही होता है ऐसा यहाँ ग्रहण कर लेना चाहिए | इस प्रकार देनेपर उदय समय से लेकर गुणश्रेणिशीर्ष तक दृश्यमान द्रव्य असंख्यातगुणित श्रेणिरूपसे अवस्थित होता है। उससे ऊपर सर्वत्र आठ वर्षेप्रमाण स्थितिसत्कर्मके ऊपर एक गोपुच्छाकाररूपसे अवस्थित होता है । दीयमान ऐसा कहने पर सर्वत्र तत्काल अपकर्षितकर सिंचित किये जानेवाले द्रव्यको ग्रहण करना चाहिए । तथा दृश्यमान ऐसा कहनेपर चिरकालीन सत्कर्मके साथ सब द्रव्यसमूहको ग्रहण करना चाहिए । दीयमान और दृश्यमान पदोंके इस अर्थकी सर्वत्र योजना करनी चाहिए । इस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व की अन्तिम फालिके पतनकी अवस्था में दीयमान और दृश्यमान द्रव्यकी प्ररूपणा की। विशेषार्थ — सम्यग्मिथ्यात्व के अन्तिम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिका और समयक्त्वके पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण अन्तिम स्थितिकाण्डककी अन्तिम फालिका पतन होकर जब सम्यक्त्वको आठ वर्षप्रमाण सत्त्वस्थिति शेष रहती है उस समय उक्त स्थिति प्रत्येक निपेक में तत्काल दीयमान और दृश्यमान द्रव्यका क्या प्रमाण रहता है यह यहाँ स्पष्ट किया गया है | यहाँ दीयमान और दृश्यमान पदका स्पष्टीकरण मूलमें किया ही है । $ ८८. पुनः तदनन्तर समय में सम्यक्त्व के अन्तर्मुहूर्त आयामसे युक्त स्थितिकाण्डकको ग्रहण कर गुणश्रेणि करनेवालेके गुणकारपरिवर्तनको बतलाते हैं । यथा - उस समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त प्रमाण स्थितिकाण्डकघात के द्वारा अपवर्तित होनेवाली सम्यक्त्वको स्थितियों में जो प्रदेशपुंज होता है, अपकर्षणभागहारके प्रतिभाग के हिसाब से उसे ग्रहणकर उदयादि गुणश्रेणिमें उसका निक्षेप करता हुआ उदयमें स्तोक प्रदेशपुञ्जको देता है । उससे अनन्तर समय में असंख्यातगुणा देता है । इसप्रकार इस क्रमसे गुणश्रेणिशीर्षके अधस्तन समय के १. ता० प्रती कायव्वा इति पाठः । २. ता० प्रती कमेण संखेज्जगुणं इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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