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________________ गाथ ११४ ] अणिकरणे कज्जविसेसपरूवणा ववत्तीए । एदेण 'मिच्छत्तवेदणीये कम्मे० ' इच्चेदिस्से गाहाए अणुसरिदो दट्ठव्वो । ९८० एवमेत्थु से दंसणमोहक्खवयववएसमेदस्स दढीकरिय संपहि अट्ठवस्सट्ठिदिसंतप्पहुडि सम्मत्तं खवेमाणस्स तदवत्थाए कीरमाणेकजभेदपदुप्पायनमुवरिमं सुत्तपबंधमाढवेइ * एत्तो पाए अंतोमुहुत्तिय विदिखंडयं । ८१. अट्ठवसमेतदिसंतकम्मावसेसप्प हुडि एतो उवरि सव्वत्थ ट्ठिदिखंडयमागाएंतो अंतोमुहुत्तपमाणमागाएदि, पलिदोवमासंखेज भागादिवियप्पाणमेदम्मि विसये क्षायिक सम्यक्त्व के प्रतिबन्धकपनेकी अपेक्षा इसकी उक्त संज्ञा बन जाती है । इस कथन द्वारा 'मिच्छत्तवेदणीए कम्मे० ' इत्यादिरूपसे इस गाथाके अर्थका अनुसरण किया गया है ऐसा जानना चाहिए । विशेषार्थ-दर्शन मोहनीयके दो प्रकृतियाँ मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व के क्षय होनेके बाद जब यह जीव सम्यक्त्व प्रकृतिका क्षय करनेका प्रारम्भ करता है तब यहाँ इसे दर्शन मोक्षपक कहा गया है । इसीपर यह प्रश्न उठा है कि यह जीव दर्शनमोहनीयका क्षय तो पहले से ही करता आ रहा है ऐसी अवस्था में यहाँसे लेकर इसे दर्शनमोहनीयका क्षपक क्यों कहा? इस प्रश्नका जो समाधान किया गया है उसका आशय यह है कि मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये दो प्रकृतियाँ तो जीवके सम्यक्त्व गुणको प्रतिबन्धक हैं ही, इसलिए जब यह जीव इन दोनों प्रकृतियोंका क्षय करनेमें प्रवृत्त रहता है तब तो विना कहे ही इसकी दर्शनमोहक्षपक संज्ञा है । इसमें कोई विवाद नहीं । किन्तु सम्यक्त्व प्रकृति सम्यक्त्व गुणकी घातक नहीं है, क्योंकि वेदक सम्यग्दृष्टिके उसका उदय रहते हुए भी सम्यक्त्व पाया जाता है, इसलिये सम्यक्त्वप्रकृतिका क्षय करनेवाले जीवको दर्शनमोहक्षपक कहना योग्य नहीं है ऐसी जिसके चित्तमें शंका है उसकी उस शंकाका परिहार करनेके लिये यहाँ सम्यक्त्व प्रकृतिकी क्षपणा करनेवाले जीवको दर्शनमोहक्षपक कहा है, क्योंकि अतिनिर्मल और निश्चल परमावगाढलक्षण क्षायिक सम्यक्त्वकी उत्पत्ति सम्यक्त्व प्रकृतिका क्षय होनेपर ही होती है । $ ८०. इसप्रकार इस स्थलपर इस जीवको दर्शनमोहक्षपक इस संज्ञा दृढ़ करके अब आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म से लेकर सम्यक्त्वका लय करनेवाले जीवके उस अवस्था में किये जानेवाले कार्यभेदका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रप्रबन्धको आरम्भ करते हैं * इससे आगे अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितिकाण्डक होता है । $ ८१. शेष रहे आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्मसे लेकर इससे आगे सर्वत्र घात के लिये स्थितिकाण्डको ग्रहण करता हुआ अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितिकाण्डकको ग्रहण करता है, क्योंकि १ ता० प्रती कीरमाणाए इति पाठः ।
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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