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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे * ताधे चेव दंसणमोहणीयखवगो ति भण्णइ 1 $ ७९. एवं भणंतस्स सुत्तयारस्सायमहिप्पायो – पुव्वं पि मिच्छत्तक्खवणपारंभपढमसमय पहुडि सव्वत्थेव दंसणमोहक्खवगववएसो ण विरुद्धो, किंतु एत्तों पहुडि च्छिणेव दंसणमोहक्खवगववएसो एदस्स दव्वो, भरेण सम्मत्तक्खवणाए पयट्टत्तादो त्ति । अधवा मिच्छत्त- सम्मामिच्छत्ताणं खवणावत्थाए दंसणमोहक्खवयववएसो अविपडिवत्तिसिद्धो त्ति ण तत्थ संदेहो, तेसिं सम्मत्तसणिदजीवगुणपडिबंधीणं दंसणमोहववएससिद्धीए मंदबुद्धीणं पि विसंवादाभावादो । किंतु ण सम्मत्तकम्मं दंसणमोहणीयं सम्मत्तगुणसहचरिदोदयत्तादो । तम्हा ण एदं खवेमाणो दंसणमोहक्खवगो त्ति एवंविहाए विप्पडिवत्तीए पच्चवच्चिमाणस्स तहाविहविप्पडिवत्तिणिरायरणदुवारेण तक्खवणावत्थाए वि दंसणमोहक्खव गववएससमत्थणमेदं भणिदमिदि गहेयव्वं । कथं पुण सम्मत्तपरिणामाविरोहेण एदस्स दंसणमोहववएसो तिचे ? ण, संपुण्णणिम्मलणिच्चल पर मावगाढलक्खण खइयसम्मत्तपडिबंधित्तेण तस्स तव्यवएसो - ५८ [ दंसणमोहक्खवणा विशेषार्थ - अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अनिवृत्तिकरण में सम्यक्त्वके आठ वर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्मके प्राप्त होने तक जिन कार्यविशेषोंका पहले निर्देश कर आये हैं उन्हीं कार्यविशेषों का इस उपसंहार सूत्र द्वारा निर्देश किया गया है। अन्य विशेषताओंके साथ पूरे अर्थका विशेष स्पष्टीकरण पहले ही कर आये हैं । * इसी समय वह दर्शनमोहनीय-क्षपक कहलाता है । $ ७९. इसप्रकार कहनेवाले सूत्रकारका यह अभिप्राय है - पहले भी मिध्यात्वकी क्षपणाका प्रारम्भ करनेके प्रथम समय से लेकर सर्वत्र ही दर्शनमोहक्षपक संज्ञा विरुद्ध नहीं है । किन्तु यहाँ से लेकर निश्चयसे ही इसके दर्शनमोहक्षपक संज्ञा जाननी चाहिए, क्योंकि यहाँसे लेकर वेगसे सम्यक्त्वकी क्षपणाके लिये प्रवृत्त हुआ है । अथवा मिथ्यात्व और सम्यग्मिध्यात्वकी क्षपणावस्था के समय दर्शनमोहक्षपक संज्ञा बिना विवाद के सिद्ध है, इसलिये उसमें सन्देह नहीं है, क्योंकि वे सम्यक्त्व संज्ञावाले जीवगुणको प्रतिबन्धक हैं, इसलिए उनकी दर्शनमोह संज्ञा सिद्ध होनेसे मन्दबुद्धिजनों को भी उसमें विसंवाद नहीं है । किन्तु सम्यक्त्वकर्म दर्शनमोहनीय नहीं है, क्योंकि वेदकसम्यग्दृष्टिके सम्यक्त्व गुणके साथ उसका उदय होता है । इसलिये इसका क्षय करनेवाला जीव दर्शनमोहका क्षपक नहीं है इसप्रकार की शंकासे प्रसित जीवकी उसप्रकारकी शंकाके निराकरण द्वारा उसकी क्षपणावस्था में दर्शनमोहक्षपक संज्ञाके समर्थनके लिये यह कहा है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । शंका-सम्यक्त्व परिणामके साथ विरोध नहीं होनेसे इसकी दर्शनमोह संज्ञा कैसे है ? समाधान -- नहीं, क्योंकि पूरी तरह से निर्मल और निश्चल परमावगाढ़ लक्षणवाले
SR No.090225
Book TitleKasaypahudam Part 13
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages402
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size13 MB
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