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________________ ४० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ माणागरिसहिंतो कोहागरिसा विसेसाहिया त्ति वुत्तं होइ । ७४. एवं णिरयोघो परूविदो। एवं सव्वासु पुढवीसु । णवरि पढमपुढवीदो अण्णत्थ संखेजवस्सियभवग्गहणालावो ण कायव्वो। संपहि देवगदीए पयदप्पाबहुअगवेसणहमाह * देवगदीए कोधागरिसा थोवा । ६७५.३ । णिरयगदीए लोभागरिसाणं थोवत्ते परूविदकारणमेत्थ वि परूवेयव्वं, विसेसाभावादो। * माणागरिसा संखेनगुणा । $ ७६. ६ । एत्थ वि कारणं सुगम, णिरयगइमायागरिसेहिं वक्खाणिदत्थादो । * मायागरिसा संखेजगुणा।। $ ७७. १८ । सुगममेदं पि सुत्तं, णिरयगदिमाणागरिसेहिं समाणपरूवणत्तादो । मायाके परिवर्तनवार मात्र क्रोधके परिवर्तनवार विशेष अधिक हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अर्थात् मानकपायके परिवर्तनवारोंमें लोभ और मायाके परिवर्तनवारोंको मिला देने पर क्रोधके परिवर्तनवार आ जाते हैं जो अपने अर्थात् क्रोधकषायके समस्त परिवर्तनवारोंके संख्यातवें भागप्रमाण हैं। इसे अंकसंदृष्टिसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। अंकसंदृष्टि पहले दे ही आये हैं। ७४. इस प्रकार ओघसे नारकियोंमें प्ररूपणा की। इसी प्रकार सब पृथिवियोंमें जानना चाहिए । इतनी विशेषता है कि पहली पृथिवीके सिवाय अन्य पृथिवियोंमें संख्यात वर्षवाले भवप्रहणरूप आलाप नहीं कहना चाहिए। अब देवगतिमें प्रकृत अल्पबहुत्वका अनुसन्धान करनेके लिए कहते हैं * देवगतिमें क्रोधकषायके परिवर्तनवार सबसे थोड़े हैं। ७५. ३ । नरकगतिमें लोभकषायके परिवर्तनवारोंके स्तोकपनेका जो कारण कह आये हैं उसे यहाँ भी कहना चाहिए, क्योंकि उससे इसमें कोई विशेषता नहीं है । तात्पर्य यह है कि देवगति प्रेयबहल गति है, इसलिए वहाँ पर क्रोधकषायके परिवर्तनवार सबसे थोड़े पाये जाते हैं । यहाँ अंकसंदृष्टि में उनकी संख्या ३ प्राप्त होती है। * उनसे मानकषायके परिवर्तनवार संख्यातगुणे हैं । ६ ७६. ६। यहाँ पर भी कारणका कथन सुगम है, क्योंकि नरकगतिमें मायाकषायके परिवर्तनोंके कथनके साथ उस अर्थका व्याख्यान कर आये हैं। तात्पर्य यह है कि देवोंमें क्रोधकषायका एक-एक परिवर्तनवार तब होता है जब मानकषायके संख्यात हजार परिवर्तनवार हो लेते हैं। पिछले चूर्णिसूत्रके प्रसंगसे अंकसंदृष्टि द्वारा क्रोधकषायके परिवर्तनवारोंकी संख्या ३ कल्पित की गई है। यहाँ मानकषायके परिवर्तनवारोंकी संख्या ६ कल्पित की है। * उनसे मायाकषायके परिवर्तनवार संख्यातगुणे हैं। $ ७७. १८ । यह सूत्र भी सुगम है, क्योंकि नरकगतिमें मानकषायके परिवर्तनवारोंके समान इसकी प्ररूपणा है। विशेपार्थ—यहाँ अंकसंदृष्टिकी अपेक्षा संख्यात हजारकी सहनानी ३ है। पूर्व में मान
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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