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________________ (८) ३. तीसरे अर्थको स्पष्ट करते हुए चूर्णिसूत्रोंमें ओघसे और चारों गतियोंमें चारों कषायोंके पुनः पुनः होनेका क्या क्रम है इसका विस्तारसे खुलासा किया है। पुनः इसके बाद किस गतिमें किस कषायके परिवर्तनवार थोड़े या अधिक किस क्रमसे होते हैं इसका अल्पबहुत्व प्रकरणद्वारा स्पष्टीकरण किया गया है। दूसरी सूत्रगाथा 'एक्कम्हि भवग्गहणे' इत्यादि है। इसमें दो अर्थ संग्रहीत हैं । यथा१. एक भवके आश्रयसे एक कषायमें कितने उपयोग होते हैं ? २. एक कषायसम्बन्धी एक उपयोगमें कितने भव होते हैं ? १. इनमेंसे प्रथम अर्थको स्पष्ट करते हुए नरकगतिकी अपेक्षा बतलाया है कि एक नरकभवमें क्रोधादि चारोंमेंसे प्रत्येक कषायके उपयोग संख्यात होते हैं अथवा असंख्यात होते हैं । इसी प्रकार शेष गतियोंमें भी जानना चाहिए। आगे गाथाके उत्तरार्धमें निबद्ध दूसरे अर्थके अनुसार भवोंके अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिये उनके निर्णयका उपाय बतलाते हुए चूर्णिसूत्र में स्पष्ट किया है कि एक वर्ष में जितने क्रोध कषायके उपयोग काल हों उनसे जघन्य असंख्यात कालको भाजित कर जो लब्ध आवे उतने वर्षके एक भवमें असंख्यात क्रोधोपयोगकाल होंगे । इसी प्रकार मान, माया और लोभ कषायकी अपेक्षा भी जानना चाहिए। तदनुसार आगे इन कषायोंसम्वन्धी असंख्यात और संख्यात उपयोगवाले भवोंके अल्पबहुत्वका प्ररूपण किया गया है। २. गाथाके उत्तरार्धमें निबद्ध दूसरे अर्थका दूसरे प्रकारसे स्पष्टीकरण इसप्रकार है कि एक कषायसम्बन्धी एक उपयोगमें कमसे कम एक और अधिकसे अधिक दो भव होते हैं। जिन जीवोंकी एक भवसे निष्क्रमणके साथ कषाय बदल जाती है उनके एक कषायसम्बन्धी एक उपयोगमें एक भव होता है। तथा जिन जीवोंकी एक भवसे निष्क्रमणके साथ कषाय नहीं बदलती है । किन्तु मरणके पूर्व पिछले भवमें जो कषाय थी वही उत्तर भवमें जन्मके समय अविच्छिन्नरूपसे पाई जाती है उनके एक कषायसम्बन्धी एक उपयोगमें दो भव होते हैं। तीसरी गाथा 'उवजोगवग्गणाओ कम्मि' इत्यादि है । इसमें क्रोधादि कषाय विषयक उपयोगवर्गणाओंके प्रमाणका ओघ और आदेशसे विचार किया गया है। उपयोगंवर्गणाएं दो प्रकारको हैं-कालोपयोगवर्गणा और भावोपयोगवर्गणा । प्रकृतमें क्रोधादि कषायोंके साथ जीवके संप्रयोग होनेको उपयोग कहते हैं तथा उसके भेदोंका नाम वर्गणा है। जघन्य उपयोगस्थानसे लेकर उत्कृष्ट उपयोगस्थान तक निरन्तररूपसे अवस्थित उनके भेदोंको उपयोगवर्गणा कहते हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। वे उपयोगोंके भेद काल और भाव दो प्रकारसे सम्भव हैं। उनमेंसे जघन्य उपयोगकालसे लेकर उत्कृष्ट उपयोगकाल तक निरन्तर रूपसे अवस्थित उनके कालकी अपेक्षा जितने भेद होते हैं उन्हें कालोपयोगवर्गणा कहते हैं। तथा तीव्र-मन्दादि भावरूपसे परिणत और जघन्य भेदसे लेकर उत्कृष्ट भेद तक छह वृद्धि क्रमसे वृद्धिंगत जितने कषाय-उदयस्थान हैं उन्हें भावोपयोगवर्गणा कहते हैं। कालोपयोगवर्गणाओंमें कषायोंके सब भेदोंका कालकी अपेक्षा विचार किया गया है और भावोपयोगवर्गणाओंमें तीव्र-मन्दादि भेदोंसे युक्त कषायउदयस्थानोंका विचार किया गया है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। यहाँ कालकी अपेक्षा भेद प्राप्त करनेके लिये प्रत्येक कषायके उकृष्ट कालमेंसे जघन्य कालके घटानेपर जो शेष रहे उसमें एक मिलाना चाहिए । ऐसा करनेसे कालोपयोगवर्गणाओंका सब प्रमाण प्राप्त हो जाता है। तथा भावकी अपेक्षा प्रमाण प्राप्त करनेके लिये प्रत्येक कषायके असंख्यात लोकप्रमाण जो उदयस्थान हैं उन्हें ग्रहण करना चाहिए। इस दृष्टिसे मानकषायमें सबसे स्तोक उदयस्थान हैं। क्रोधकषायमें उनसे विशेष अधिक उदयस्थान हैं । मायाकषायमें उनसे विशेष अधिक उदयस्थान हैं और लोभकषायमें उनसे विशेष अधिक उदयस्थान हैं। इस प्रकार इस गाथासूत्रमें उक्त दो प्रकारको वर्गणाओंका तथा उनके स्वस्थान और परस्थान सम्बन्धी अल्पबहुत्त्वका विचार किया गया है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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