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________________ ( ९ ) ater गाथा 'एक्कम्हि य अणुभागे' इत्यादि है । चूणिसूत्रकारके समक्ष इस गाथाका दो प्रकारका उपदेश उपलब्ध था — प्रवाह्यमान और अप्रवाह्यमान । सर्व आचार्य सम्मत और चिरकालसे अविच्छिन्न परम्परा आये हुए उपदेशको प्रवाह्यमान उपदेश कहते हैं तथा जो सर्व आचार्य सम्मत अविच्छिन्न परम्परासे आया हुआ उपदेश नहीं है उसे अप्रवाह्यमान उपदेश कहते हैं । यहाँ ' अथवा ' कहकर भगवान् नागहस्तिके उपदेशको प्रवाह्यमान उपदेश बतलाया है और भगवान् आर्यमंक्षुके उपदेशको अप्रवाह्यमान उपदेश बतलाया है । उनसे अप्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार अनुभाग कारण है और कषायपरिणाम उसका कार्य है ऐसा भेद न कर जो कषाय है वही अनुभाग है इसप्रकार दोनोंमें एकत्व स्थापित कर गाथासूत्रका स्पष्टीकरण करते हुए बतलाया है कि नरकादि गतियोंमेंसे नरकगति और देवगति एक कालमें कदाचित् एक कषाय-उपयुक्त, कदाचित् दो कषायउपयुक्त, कदाचित् तीन- कषाय उपयुक्त और कदाचित् चार- कषाय- उपयुक्त होती हैं । कारण कि नरकगतिमें क्रोधकषायका काल सब से अधिक है, इसलिए कदाचित् सब नारकी जीव यदि एक कषायसे परिणत तो वे सब क्रोधकषायरूपसे ही परिणत होंगे। और यदि दो कषायरूपसे परिणत हों तो क्रोधकषायके साथ अन्यतर कोई कषाय होगी । इसी प्रकार तीन और चार कषायोंकी अपेक्षा भी विचार कर लेना चाहिए । तथा देवगतिमें लोभकषायका काल सबसे अधिक है । अतः सब देवोंमें यदि एक कषाय होगी तो लोभकषाय ही होगी । और दो कषाय होंगी तो लोभके साथ अन्यतर कोई कषाय होगी । इसी प्रकार तीन और चार कषायों के विषय में भी जानना चाहिए । अब रही तिर्यञ्चगति और मनुष्यगति सो इनमें सदा ही चारों कषायोंसे परिणत जीव पाये जाते हैं । प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार कषायपरिणाम ही अनुभाग नहीं है, किन्तु जो कषाय-उदयस्थान हैं वही अनुभाग है । इसप्रकार इन दोनोंमें कारण और कार्यकी अपेक्षा भेद है । कषाय-उदयस्थानस्वरूप अनुभाग कारण है और कषायपरिणाम कार्य है । इसप्रकार प्रवाह्यमान उपदेशके अनुसार कषाय और अनुभाग में भेदका निर्देश कर तथा उक्त गाथासूत्रमें आये हुए 'एक्ककालेण' पदका अर्थ कषायोपयोगाद्धास्थान करके बतलाया है कि इस गाथासूत्र में एक कषाय-उदयस्थानमें तथा एक कषायोपयोगाद्धास्थान में कौन गति होती है अथवा अनेक कषाय-उदयस्थानोंमें और अनेक कषाय-उपयोगाद्धास्थानोंमें कौन गति होती है यह पृच्छा की गई है । आगे इसका समाधान करते हुए बतलाया है कि एक-एक कषाय-उदयस्थानमें अधिक से अधिक आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण त्रस जीव रहते हैं । इससे ज्ञात होता है कि त्रसजीव नियमसे अनेक कषाय-उदयस्थानोंमें रहते हैं, क्योंकि सब त्रसराशि जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण है अतः उनका एक कालमें अनेक कषाय-उदयस्थानोंमें रहना युक्तिसे सिद्ध होता है । तथा एक-एक कषायोपयोगाद्धास्थान में अधिक से अधिक असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण त्रस जीव रहते हैं, क्योंकि सब कषायोपयोगाद्धास्थान अन्तर्मुहूर्त के समयप्रमाण है, और त्रसराशि जगप्रतर के असंख्यातवें भागप्रमाण है, इसलिए एक- एक कषाय - उपयोगाद्धास्थान में असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण जीवोंका रहना बन जाता है । यद्यपि न तो सब कषाय-उदयस्थानों में त्रसजीव सदृशरूपसे पाये जाते हैं और न ही सब कषायोपयोगाद्धास्थानों में भी सोंका समान विभाग होकर पाया जाना सम्भव है तो भी समीकरण विधान के अनुसार दोनों स्थलों पर यह निर्देश किया है । उक्त दोनों तथ्योंसे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नरकादि प्रत्येक गति में भी यह प्ररूपणा अविकल - रूपसे घटित हो जाती है । इसका विशेष खुलासा अल्पबहुत्व के निर्देशद्वारा मूलमें किया ही 1 'केवडिया उवजुत्ता' यह पाँचवीं सूत्र गाथा है । यह गाथासूत्र कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका आठ अनुयोग द्वारोंके आलम्बनसे विवेचन करनेकी सूचना देती है । वे आठ अनुयोगद्वार हैं--सत्प्ररूपणा, द्रव्य (संख्या) प्रमाण, क्षेत्रप्रमाण, स्पर्शन, काल, अन्तर, भागाभाग और अल्पबहुत्व । गति आदि जो चौदह मार्गणास्थान हैं उनमें से कषायके सिवाय तेरह मार्गणास्थानों में उक्त आठ अनुयोगद्वारोंका अवलम्बन लेकर कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका सर्वांगीण विचार करना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है । विशेष स्पष्ट्रीकरण मूलमें किया ही है, इसलिए वहाँसे जान लेना चाहिए ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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