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________________ ३५ गाथा ६३ ] पढमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा ६४. जहा ओघपरूवणाए लोभो माया कोधो माणो त्ति एदीए अवट्ठिदपरिवाडीए असंज्जेसु आगरिसेसु गदेसु तदो अण्णारिसी परिवाडी होदि तहा एत्थ पत्थि, किंतु एत्थ णिरयगदीए कोधो माणो कोधो माणो त्ति एसा अवट्ठिदपरिवाडी। एदीए परिवाडीए वारसहस्साणि परियट्टिदूण तदो सई मायापरिवत्ती होइ । किं कारणं ? णेरइएसु अच्चंतदोसबहुलेसु कोह-माणाणं चेव पउरं संभवादो । एवं पुणो-पुणो परिवत्तमाणे मायापरिवत्ता वि संखेजसहस्समेत्ता जादा। तदो अण्णो विसरिसपरिवाडीए वियप्पो होदि त्ति पदुप्पायणट्ठमाह * मायापरिवत्तेहिं संखेज्जेहिं गदेहिं सइं लोहो परिवत्तदि । ६५. संखेजसहस्सेहिं मायापरिवत्तेहिं पादेकं कोह-माणाणं संखेज परिवत्तणसहस्साविणाभावीहिं गदेहिं तदो सई लोभेण परिणमदि त्ति भणिदं होदि । कुदो एवं चेव ? णिरयगदीए अच्चंतपापबहुलाए पेजसरूवलोहपरिणामस्स सुट्ट दुल्लहत्तादो । एवमेस कमो ताव जाव अप्पणो णिरुद्धभवद्विदीए चरिमसमयो त्ति । संपहि दोण्हं एदेसि सुत्ताणं संदिट्टिमुहेण समुदायत्थपरूवणं कस्सामो। तं जहा—णिरयगदीए संखेजवस्साउअभवे असंखेञ्जवस्साउअभवे वा कोहो माणो १ १ ० ० पुणो वि कोहो माणो त्ति २ २ ० ० एवंविहेसु संखेजसहस्सपरिवत्तणवारेसु गदेसु तदो अंतिमवारे $ ६४. जिस प्रकार ओघप्ररूपणाकी अपेक्षा लोभ माया, क्रोध, मान इस प्रकार अवस्थित परिपाटीके अनुसार असंख्यात परिवर्तनवारोंके होनेपर तदनन्तर अन्य प्रकारकी परिपाटी होती है उस प्रकार यहाँ नहीं है, किन्तु यहाँ नरकगतिमें क्रोध-मान पुनः क्रोध मान यह अवस्थित परिपाटी है। इस परिपाटीसे हजारों वार परिवर्तन करके तदनन्तर एक बार मायारूप परिवर्तन होता है, क्योंकि नारकी जीव अत्यन्त दोषबहुल होते हैं, इसलिए उनमें क्रोध और मानकी ही प्रचुरता पाई जाती है। इस प्रकार पुनः-पुनः परिवर्तन होनेपर मायारूप परिवर्तन भी संख्यात हजार वार हो जाते हैं। तब विसदृश परिपाटीके अनुसार अन्य विकल्प होता है इस बातका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं * मायासम्बन्धी संख्यात हजार परिवर्तनवारोंके होनेपर एकवार लोभसम्बन्धी परिवर्तनवार होता है। $ ६५. मायासम्बन्धी प्रत्येक परिवर्तनवार क्रोध और मानके संख्यात हजार परिवर्तनवारोंका अविनाभावी है और इस प्रकार मायासम्बन्धी संख्यात हजार परिवर्तनवारोंके होनेके पश्चात् एक वार लोभरूपसे परिणमता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका-ऐसा किस कारणसे होता है ? समाधान-अत्यन्त पापबहुल नरकगतिमें प्रेयस्वरूप लोभपरिणाम अत्यन्त दुर्लभ है। इस प्रकार यह क्रम अपनी विवक्षित स्थितिके अन्तिम समय तक चलता रहता है। अब इन दोनों सूत्रोंके समुच्चयरूप अर्थकी संदृष्टि द्वारा प्ररूपणा करेंगे। यथा--नरकगतिमें संख्यात वर्षकी आयुवाले भवमें या असंख्यात वर्षकी आयुवाले भवमें क्रोध-मान १ १ ० ० पुनः क्रोध-मान २ २ ० ० इस प्रकारके संख्यात हजार परिवर्ननवारोंके हो जानेपर अन्तिम
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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