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________________ ३४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ सरिसा होदूण जाव ण गदा ताव लोभादीणमागरिसा अहिया ण होंति त्ति सुत्तवयणादो। * एवमोघेण । $ ६२. एवमेसा ओघेण चउण्हं कसायाणमभिक्खमुवजोगपरूवणा कया। एत्तो आदेशपरूवणं वत्तइस्सामो। तत्थ वि तिरिक्ख-मणुसगदीसु ओघपरूवणादो पत्थि णाणत्तमिदि तप्पदुप्षायणट्ठमप्पणासुत्तमाह * एवं तिरिक्खजोणिगदीए मणुसगदीए च। ६३. सुगममेदमप्पणासुत्तं, विसेसाभावणिबंधणत्तादो । संपहि णिरयगदीए अभिक्खमुवजोगविसेसपदुप्पायणट्ठमुवरिमं पबंधमाह * णिरयगईए कोहो माणो कोहो माणो त्ति वारसहस्साणि परियत्तिदूण सई माया परिवत्तदि। असंख्यात परिवर्तनवार सदृश होकर जब तक व्यतीत नहीं होते तब तक लोभादिकके अधिक परिवर्तनवार नहीं होते ऐसा यह सूत्रवचन है । विशेषार्थ—पहले यह बतला आये हैं कि जब अपनी-अपनी परिपाटि योंके अनुसार लोभके एक-एक कर परिवर्तनवार असंख्यात हो जाते हैं तब एक बार मायाका परिवर्तनवार अधिक होता है। यहाँ क्रोधका परिवर्तनवार एकवार अधिक कैसे होता है यह बतलाया गया है। क्रम यह है कि जब लोभके परिवर्तनवार असंख्यातवार अधिक हो जाते हैं तब मायाका परिवर्तनवार एकवार अधिक होता है और इस विधिसे जब मायाके परिवर्तनवार असंख्यात अधिक हो जाते हैं तब एकवार क्रोधका परिवर्तनवार अधिक होता है । आगे भी यही क्रम है। इस अन्तिम संदृष्टिके पूर्व चारों कषायोंके परिवर्तनवारोंको सूचित करनेके लिए जो संदष्टि दी है उसमें जो विधि स्वीकार की गई है उसका खुलासा यहाँ पूर्व में अंक संदृष्टि द्वारा किया ही है। उसके अनुसार अंक संदृष्टिकी अपेक्षा लोभके परिवर्तनवार ४४, मायाके परिवर्तनवार ३५, क्रोधके परिवर्तनवार ३३ और मानके परिवर्तनवार ३२ प्राप्त होते हैं। * यह प्ररूपणा ओघसे की गई है। $ ६२. इस प्रकार चारों कषायोंके पुनः पुनः उपयुक्त होनेकी यह प्ररूपणा ओघसे की गई है। इससे आगे आदेशप्ररूपणाको बतलावेंगे। उसमें भी तिर्यञ्चगति और मनुष्यगतिमें ओघप्ररूपणासे आदेशप्ररूपणामें भेद नहीं है, इसलिए उसका कथन करनेके लिए अर्पणा सूत्रको कहते हैं * इसी प्रकार तिर्यञ्चयोनिगतिमें और मनुष्यगतिमें जानना चाहिए। ६३. यह अर्पणासूत्र सुगम है, ओघसे इन दोनों गतियों में विशेषताका अभाव इसका कारण है। अब नरकगतिमें पुनः पुनः उपयोगविशेषका कथन करनेके लिए आगेके प्रबन्धको कहते हैं * नरकगतिमें क्रोध-मान पुनः क्रोध-मान इस प्रकार हजारोंवार परिवर्तन होकर एकवार मायारूप परिवर्तन होता है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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