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________________ १३ गाथा ६९] गाहासुत्ताणं अत्थपरूवणां तिविहाए सेढीए विसेसियूण पुणो वि परूवणे कीरमाणे पुणरुत्तदोसासंमवादो। अधवा तत्थ परूविदसंचयप्पावहुअस्स साहणभावेण पवेसप्पाबहुअपरूवणट्ठमेदमोइण्णमिदि ण को त्थि दोसो। $ १६. एत्थ वुण गाहापच्छद्धे पदसंबंधो एवं कायव्यो-णिरयादिगदीसु पढमसमयोवजुत्तेहिं आढत्ता जाव चरिमसमयोवजुत्ता त्ति ताव जीवा 'बोद्धव्वा' अणुगंतव्वा त्ति । तत्थ 'पढमसमयोवजुत्तेहिं ति भणिदे अयं वयणविसेसो सव्वत्थोवा इदि एदमादिपदमवेक्खदे, समयसहस्स पदवाचयस्स गहणादो। चरिमसमए च बोद्धव्वा' त्ति एवं पि वयणमंते पढमाणसव्वबहुअरासिमवेक्खदे। तदो एकिस्से गदीए कसायोवजोगजुत्ताणं जीवाणं थोवपदं बहुअपदं च जाणियण जीवप्पाबहुअं कायव्वमिदि एसो एत्थ भावत्थो । तत्थ णिरयगदीए पढमसमयोवजुत्ता लोभकसायिजीवा चरिमसमयोवजुत्ता च कोधजीवा, देवगदीए कोहोवजुत्ता पढमा लोभोवजुत्ता चरिमा, तिरिक्ख-मणुस्सेसु माणोवजुत्ता पढमा. वत्तव्या, सव्व पच्छा लोभोवजुत्तजीवा वत्तव्वा । एत्थ गाहासुत्तपरिसमत्तीए सत्तण्हमंकविण्णासो किमटुं कदो? एदाओ सत्त चेव गाहाओ उवजोगाणिबना कर फिर भी कथन करने पर पुनरुक्त दोष सम्भव नहीं है । अथवा वहाँ कहे गये संचय अल्पबहुत्वके साधनरूपसे प्रवेश अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिए यह वचन आया है, इसलिए कोई दोष नहीं है। ६ १६. यहाँ गाथाके उत्तरार्धमें इसप्रकार पदसम्बन्ध करना चाहिए-नरकादि गतिर्यो में प्रथम समयमें उपयुक्त हुए जीवोंसे लेकर अन्तिम समयमें उपयुक्त हुए जीवों तक जीव 'बोद्धव्वा' अर्थात् जानने चाहिए। वहाँ 'पढमसमयोवजुत्तेहिं' ऐसा कहने पर यह वचनविशेष 'सव्वत्थोवा' इस प्रकार इस प्रथम पदकी अपेक्षा करता है, क्योंकि समय शब्द पदका वाची ग्रहण किया गया है। 'चरिमसमए च बोद्धव्वा' इस प्रकार यह वचन भी अन्तमें कही गई सबसे बहत राशिकी अपेक्षा करता है। इसलिए एक गतिमें कषायमें उपर उपयुक्त हुए जीवोंके स्तोकपद और बहुत पदको जान कर जीवविषयक अल्पबहुत्व करना चाहिए इस प्रकार यह यहाँ पर भावार्थ है । वहाँ नरकगतिमें प्रथम समयमें उपयुक्त हुए लोभकषायवाले जीव और अन्तिम समयमें उपयुक्त हुए क्रोधकषायवाले जीव, देवगतिमें क्रोधकषायमें उपयुक्त हुए जीव प्रथम और लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीव अन्तमें तथा तिर्यञ्च और मनुष्यगतिमें मानकषायमें उपयुक्त हुए जीव प्रथम कहने चाहिए तथा सबसे अन्तमें लोभकषायमें उपयुक्त हुए जीव कहने चाहिए। शंका-यहाँ पर गाथासूत्रोंके समाप्त होने पर सातका अंकविन्यास किसलिए किया है ? समाधान—ये सात ही गाथाएं उपयोग अनुयोगद्वारमें निबद्ध हैं, अन्य नहीं इस १. प्रतिषु -मुवेक्खदे इति पाठः । २. प्रतिषु -मुवेक्खदे इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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