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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ पुणो तम्मि केत्तिया भवा होति ति पुच्छिदे जह० एगो भवो होदि, उक्क० दोण्णि भवग्गहणाणि त्ति वत्तव्वं । तं कथं ? एक्को तिरिक्खो मणुसो वा कोहकसायं पूरेदणंतोमुत्तमच्छिदो। पुणो अविणद्वेणेव तेण कोधोवजोगेण णेरइएसुप्पादं लहदे । एवं च लब्भमाणे एगकसायोवजोगम्हि दुवे भवा लद्धा भवंति, अण्णहा वुण एगो' चेव भवो त्ति । संपहि जहावसरपत्ताए तदियगाहाए समोदारो कीरदे । तं जहा(१२) उवजोगवग्गणाओ कम्मि कसायम्मि केत्तिया होति । __ कदरिस्से च गदीए केवडिया वग्गणा होंति ॥६५॥ ६९. एसा तदियगाहा । संपहि एदिस्से अत्थपरूवणे कीरमाणे उवजोगवग्गणाओ णाम दुविहाओ हवंति-कालोवजोगवग्गणाओ च भावोवजोगवग्गणाओ च । तासिं सरूवणिदेसमुवरि कस्सामो। पुणो तासिं दुविहाणं पि वग्गणाणं परूवणा पमाणमप्पाबहुअं च ओघादेसभेयभिण्णमेदम्मि गाहासुत्ते पडिबद्धमिदि घेत्तव्वं । ण च पमाणाणुगमो एक्को चेव एत्थ पडिबद्धो त्ति आसंकणिज्जं, पमाणाणुगमस्स परूवणप्पाबहुआविणाभाविणो णिद्देसेण तेसि पि एत्थेवंतब्भावदसणादो। तत्थ 'उवजोगवग्गउसमें कितने भव होते हैं ऐसा पूछनेपर जघन्यरूपसे एक भव होता है और उत्कृष्टरूपसे दो भव होते हैं ऐसा कहना चाहिए । शंका-वह कैसे ? समाधान—एक तिर्यश्च या मनुष्य क्रोधकषायको पूरकर अन्तमुहूर्त काल तक रहा पुनः अविनष्ट हुए उसी क्रोधकषायसम्बन्धी उपयोगके साथ नारकियोंमें उत्पन्न होता है । इस प्रकार उसी कषायके साथ अन्य पर्यायमें जानेपर एक कषायसम्बन्धी उपयोगमें दो भव प्राप्त होते हैं । अन्यथा एक ही भव प्राप्त होता है। अब अवसर प्राप्त तीसरी गाथाका अवतार करते हैं । यथा * किस कषायमें कितनी उपयोगवर्गणाएं होती हैं तथा किस गतिमें कितनी उपयोगवर्गणाएं होती हैं ॥६६॥ __$९ यह तीसरी गाथा है । अब इस गाथाके अर्थका कथन करने पर उपयोग वर्गणाऐं दो प्रकारकी होती हैं-कालोपयोगवर्गणा और भावोपयोगवर्गणा। उनके स्वरूपका निर्देश आगे करेंगे। उन दोनों ही प्रकारकी वर्गणाओंकी प्ररूपणा, प्रमाण और अल्पबहुत्व ओघ और आदेशसे अलग-अलग इस गाथासूत्रमें निबद्ध है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए । एक प्रमाणानुगम ही इस गाथामें निबद्ध है ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि प्ररूपणा और अल्पबहुत्वके अविनाभावी प्रमाणानुगमका निर्देश करनेसे उनका भी यहाँ अन्तर्भाव देखा जाता है । 'उपयोगवर्गणाएं हैं' गाथाके इस पूर्वार्ध द्वारा कालोपयोगवर्गणाओं १. ता० प्रती अण्णहाणुएगो इति पाठः। २. आ० प्रती -वग्गणा इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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