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________________ गाथा ६४] गाहामुत्ताणं अत्थपरूवणा 'कदि भवा च' कियन्तो भवा सम्भवन्तीत्यतीते काले' इति प्रश्नः कृतो भवति । अयं पुनरत्र वाक्यार्थः-णिरयादिगदीसु एयस्स जीवस्स बहुआ भवपरिवत्तणवारा अदीदकालसंबंधिणो वदिकंता । ते च दुविधा-कोहादिकसायाणं संखेजोवजोगिगा असंखेजोवजोगिगा चेदि । तत्थेगकसायस्स किं संखेजोवजोगिगा भवा बहुगा, आहो असंखेजोवजोगिगा ति सत्थाणेण पुणो परत्थाणेण च जमप्पाबहुअविहाणं तमेदम्मि गाहापच्छिमद्धम्मि पडिबद्धमिदि। कथमेवं विहो अत्थो एत्थ समुवलब्भइ ति चे वुच्चदे-'एक्कम्मि य उवजोगे' ति एत्थतणएगसदो एगकसायविसयाणमणेगोवजोगाणं णाणाकालपडिबद्धाणं जाइदुवारेण पत्तेयत्ताणं जेण वाचओ, तेण एकस्स कसायस्स अणेगेसु उवजोगेसु अदीदकालविसएसु एगभवप्पणाए संखेजासंखेज्जभेयभिण्णेसु केत्तिया भवा होंति ? के थोवा, के वा बहुगा ति सुत्तत्थावलंबणादो पयदत्थोवलद्धी ण विरुज्झदे । एवमेदे दुवे अत्था एत्थ गाहासुत्ते पडिबद्धा । ८. एदस्स गाहापच्छिमद्धस्स वक्खाणमेवं करेंता वि अत्थि-जहा, एक्कम्मि य उवजोगे त्ति वुत्ते एगकसायविसयाणमणेगोवजोगाणं णाणाकालसंबंधीणं गहणं ण कायव्वं, किं तु एकस्सेव उवजोगस्स अंतोमुहुत्तकालावच्छिण्णपमाणस्स गहणं कायव्वं । है। 'कदि भवा च' कितने भव सम्भव हैं इस प्रकार अतीत कालके विषयमें यह प्रश्न किया गया है। यहाँपर इस वाक्यका यह अर्थ है-नरकादि गतियों में एक जीवके अतीत काल सम्बन्धी बहुत परिवर्तनवार व्यतीत हो गये हैं। वे दो प्रकारके हैं-क्रोधादि कषायसम्बन्धी संख्यात उपयोगवाले भव परिवर्तनवार और असंख्यात उपयोगवाले भव परिवर्तनवार । उनमें से क्या एक कषायसम्बन्धी संख्यात उपयोगवाले भव बहुत हैं या असंख्यात उपयोगवाले भव बहुत हैं इस प्रकार स्वस्थानकी अपेक्षा और परस्थानकी अपेक्षा जो अल्पबहुत्वका विधान है वह इस गाथाके उत्तरार्धमें प्रतिबद्ध है। शंका-इस प्रकारका अर्थ यहाँ कैसे उपलब्ध होता है ? समाधान-'एक्कम्मि य उवजोगे' इस प्रकार यहाँपर आया हुआ एक शब्द नानाकालसम्बन्धी एक कषायविषयक अनेक उपयोगोंमें से यतः जातिद्वारा प्रत्येकका वाचक है इसलिए एक भवकी मुख्यतासे संख्यात और असंख्यात भेदवाले अतीत कालविषयक एक कषायसम्बन्धी अनेक उपयोगोंमें कितने भव होते हैं ? कौन थोड़े होते हैं और कौन बहुत होते हैं इस प्रकार सूत्रके अर्थका अवलम्बन करनेपर प्रकृत अर्थकी उपलब्धि विरोधको प्राप्त नहीं होती । इस प्रकार ये दो अर्थ इस गाथासूत्रमें प्रतिबद्ध हैं। $ ८. गाथाके इस उत्तरार्धका व्याख्यान इस प्रकार करनेवाले भी हैं। यथा 'एक्कम्मि य उवजोगे ऐसा कहने पर एक कषाय विषयक नानाकाल सम्बन्धी अनेक उपयोगोंका ग्रहण नहीं करना चाहिए, किन्तु अन्तर्मुहूर्त कालवाले एक ही उपयोगका ग्रहण करना चाहिए । पुनः १. ता० प्रतौ -त्यतीतकाले इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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