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________________ २६६ २७२ ( ४९ ) पृ. सं. उक्तविषयक आदेशप्ररूपणा २२७ अपूर्वकरणके प्रथम समयमें गुणश्रेणि निक्षेप स्थिति आदिको अपेक्षा उक्त विषयका का प्रमाण २६४ विचार २९ गुणश्रेणि विन्यासक्रमका निर्देश २६५ उक्तजीव अन्तर कहां करता है और स्थितिकाण्डक उत्कीरण काल और स्थितिउपशामक कहाँ होता है इसका निर्देश २३० बन्धगडाकी तुल्यताका निर्देश चौथी गाथाकी अर्थविभाषा २३०-२३३ एक स्थितिकाण्डक कालमें अनभाग काण्डकोंकेअपूर्व-अनिवृत्तिकरण जीवके स्थितिघात प्रमाणका निर्देश २६७ __अनुभागघातका निर्देश २३१ स्थितिकाण्डकके समाप्त होने पर अनुभागअधःप्रवृत्तकरणके समयमें स्थिति अनुभाग काण्डक और स्थितिबन्धगता समाप्त __ काण्डक घात नहीं होते इसका निर्देश २३३ होते है इसका निर्देश २६८ दर्शनमोहका उपशम करनेवालेके तीन अपूर्व करणके प्रथम और अन्तिम समयमें करणोंका नाम निर्देश और उनके स्थितिसत्कर्मका विचार २६९ लक्षण २३३ उक्त सब विषयोंका अनिवृत्तिकरणमें विचार २७१ चौथी उपशामनाद्धाका लक्षण सहित अन्तर करणविधि बादिका निर्देश निर्देश २३४ दर्शनमोहनीयको जितनी प्रकृतियोंकी सत्ता अधःप्रवृत्तकरणके लक्षणका विस्तारसे होतो है उनका अन्तर करता है . २७५ निरूपण २३४ अन्तर करने पर जीव उपशामक कहलाता उसी प्रसंगसे अनुकृष्टिका लक्षण व प्ररूपणा २३५ है इसका निर्देश २७६ निर्वर्गणाकाण्डकका स्पष्टीकरण २३६ आगाल-प्रत्यागाल विषयक सूचना २७६ प्रकारान्तरसे अधःप्रवृत्तकरणके परिणाम मिथ्यात्वकी गुणश्रेणिका विशेष निर्देश २७७ स्थानोंके खण्डोंका निर्देश २३८ शेष कर्मोंकी गुणश्रेणिका विचार २७९ उक्त परिणामोंका विशुद्धिविषयक स्व. एक आवलि काल शेष रहने पर मिथ्यात्वस्थान अल्पबहुत्व ૨૪૪ का घात नहीं होता २८० विशद्धिविषयक परस्थान अल्पबहुत्व २४५ प्रथमोपशम सम्यक्त्वके प्रथम समयमें अपूर्वकरणमें परिणाम पंक्ति और विशुद्धि मिथ्यात्वके तीन खण्ड करने की विधिविषयक अल्पबहुत्व २५२ का निर्देश अनिवृत्तिकरणमें परिणामस्थानोंका विचार २५६ मिथ्यात्वके अतिरिक्त शेष कोके विषपमें अनादि मिथ्यादृष्टि उपशामककी प्ररूपणाके विशेष कथन कथन करनेका निर्देश २५७ २५ पदवाला अल्पबहुत्व दण्डक अधःप्रवृत्तकरणमें होनेवाले और न होने वाले कार्योंका निर्देश दर्शनमोहके उपशम करनेका अधिकारी कोन वहाँ अप्रशस्त और प्रशस्त कर्मोके अनु जीव है इसका प्रथम व द्वितीय सूत्र भाग बन्धका निर्देश गाथामें निर्देश २५८ वहीं स्थितिबन्धविषयक निर्देश दर्शनमोहका उपशम करते समय न होनेवाले २५६ और उसके बादमें होनेवाले कार्योंका अपर्वकरणमें स्थितिकाण्डकोंके प्रमाणका तीसरी गाथा द्वारा निर्देश ३०२ वहीं स्थितिबन्धका विचार . दर्शनमोहका उपशम करनेवालेके उपयोग अनुभाग काण्ड तथा तद्विषयक अल्पबहुतत्व आदिका विचार करनेका चौथी सूत्र का विचार २६१ गाथा द्वारा निर्देश ३०४ २५८ निर्देश २६.
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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