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________________ ( ४१ ) अतः कषायप्राभृत मूल तथा चूणिके रचनाकालको आधार मानकर इस प्रकरणमें इनको श्वेताम्बर आचार्योकी कृति सिद्ध करनेका जो प्रयत्न किया गया है वह किस प्रकार तर्क और प्रमाण हीन है इसका सांगोपांग विचार किया। ९ सिका आगे खवगसेढिकी प्रस्तावनामें 'कषायप्राभूत चुणिनी रचनाना काल अंगे वर्तमान सम्पादकोनी मान्यता' आदि कतिपय शीर्षकोंके अन्तर्गत प्रस्तावना लेखकने जो विचार व्यक्त किये हैं, उनकी विस्तृत मीमांसाकी तत्काल आवश्यकता न होनेसे विधिरूपसे उनमेंसे कुछ मुद्दों पर संक्षेपमें प्रकाश डाल देना आवश्यक प्रतीत होता है। ( १ ) त्रिलोक प्रज्ञप्तिके अंतमें ये दो गाथाएँ पाई जाती हैं पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणवसहं । दट्ठ ण परिसवसहं जदिवसहं धम्मसुत्तपाढए वसहं ।। चुण्णिस्सरूवत्थकरणसरूवपमाण होइ किं जं तं । अट्ठसहस्सपमाणं तिलोयपण्णत्तिणामाए । इनमेंसे प्रथम गाथा जयधवला सम्यक्त्व अधिकारके मंगलाचरणके रूपमें पाई जाती है। उसका पाठ ' इस प्रकार है पणमह जिणवरवसहं गणहरवसहं तहेव गुणहरवसहं । दुसहपरीसहविसहं जइवसहं धम्मसुत्तपाढरवसहं ।। इसका अर्थ है कि जिनवरवृषभ, गणधरवृषभ, गुणधरवृषभ तथा दुःसह परीषहोंको जीतनेवाले और धर्मसूत्रके पाठकोंमें श्रेष्ठ यतिवृषभको तुम सब प्रणाम करो । त्रिलोकप्रज्ञप्तिके अन्तमें आई हुई इस गाथाका पाठभेदके होते हुए भी लगभग यही अर्थ है। पाठभेद लिपिकारोंके प्रमादसे हुआ जान पड़ता है। अब विचार यह करना है कि यह गाथा त्रिलोकप्रज्ञप्तिसे उठाकर जयधवलामें निक्षिप्त की गई है या जयधवलासे उठाकर त्रिलोकप्रज्ञप्तिमें निक्षिप्त की गई है। सम्यक्त्व अधिकारके प्रारम्भमें आई हई उक्त मंगल गाथाके बाद वहाँ एक दूसरी गाथा भी पाई जाती है जिसपर दृष्टिपात करनेसे तो ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त मंगलगाथा जयधवलाके सम्यक्त्व अधिकारकी ही होनी चाहिए, क्योंकि इस गाथाके पूर्वार्ध द्वारा उक्त गाथाके मंगलार्थका समर्थनकर उत्तरार्ध द्वारा विषयका निर्देश किया गया है । वह गाथा इस प्रकार है इय पणमिय जिणणाहे गणणाहे तह य चेव मणिणाहे। सम्मत्तसुद्धिहेउं वोच्छं सम्मत्तमहियारं ॥ वैसे वर्तमानमें त्रिलोकप्रज्ञप्ति ग्रन्थ जिस रूपमें पाया जाता है वह संग्रहग्रन्थ न होकर एक कर्तृक होगा यह मानना बद्धिग्राह्य नहीं प्रतीत होता और इसीलिए जयधवलाकी प्रस्तावना ( १० ६५ टिप्पणी) में यह स्पष्ट स्वीकार कर लिया गया है कि 'वर्तमानमें त्रिलोकप्रज्ञप्ति ग्रन्थ जिस रूप में पाया जाता है उसी रूपमें आचार्य यतिवषभने उसकी रचनाकी थी, इस बातमें हमें सन्देह है।' फिर भी जयधवला सम्यक्त्व अधिकारको उक्त मंगलगाथाका 'चुण्णिस्सरूव' इत्यादि गाथाके साथ त्रिलोकप्रज्ञप्ति ग्रन्थके अन्तमें पाया जाना इस तथ्यको अवश्य ही सूचित करता है कि इस ग्रन्थके साथ आचार्य यतिवृषभका किसी न किसी प्रकारका सम्बन्ध अवश्य हो होना चाहिए। बहुत सम्भव है धवलामें जिस त्रिलोकप्रज्ञप्ति ग्रन्थका उल्लेख पाया जाता है उसकी रचना स्वयं यतिवृषभ आचार्यने की हो और उसको मिलाकर वर्तमान त्रिलोकप्रज्ञप्ति ग्रन्थका संग्रह किया गया हो। अन्यथा उक्त मंगलगाथाको वहाँ
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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