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________________ रचनाओंसे सम्बन्ध रखनेवाला बहुत-सा उच्चारणा वृत्ति आदि रूप साहित्य जयधवलाकारके सामने रहा है। और इससे सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि उच्चारणा वृत्ति आदि नामसे अभिहित किये गये उक्त साहित्यसे वे इस बातका निर्णय करते होंगे कि इनमेंसे कौन उपदेश अप्रवाह्यमान होकर आर्यमंक्षु द्वारा प्रतिपादित है, कौन उपदेश प्रवाह्यमान होकर आर्य नागहस्ति या दोनों द्वारा प्रतिपादित है और कौन उपदेश ऐसा है जिसके विषयमें उक्त प्रकारसे निर्णय करना, सम्भव न होनेसे केवल चूणिसूत्रोंके आधारसे प्रवाह्यमान और अप्रवाह्यमान रूपसे उनका उल्लेख किया गया है। प्रस्तुत ( १२ वें) भागमें पद-पद पर इस विषयके ऐसे अनेक उल्लेख आये हैं जिनसे प्रत्येक पाठकको उक्त कथनकी पूरी जानकारी मिल जाती है यथा १. आर्यमंक्षुका उपदेश अप्रवाह्यमान है और नागहस्तिका उपदेश प्रवाह्यमान है । यथा अथवा अञ्जमंखुभयवंताणमुवएसो एत्थापवाइज्जमाणो णाम । णागहस्तिखवणाणमुवएसो पवाइज्जतश्रोति घेत्तव्वो। (पृ. ७१) यहाँ उपयोग अर्थाधिकारकी ४ थी गाथाके व्याख्यानका प्रसंग है। उसमें कषाय और अनुभागकी चर्चा के प्रसंगसे आचार्य यतिवृषभने उक्त दोनों आचार्योंके दो उपदेशोंका उल्लेख किया है। उनमेंसे कषाय और अनुभाग एक हैं यह बतलानेवाले भगवान् आर्यमंक्षुके उपदेशको जयधवलाके टीकाकारसे अप्रवाह्यमान कहा है और कषाय और अनुभागमें भेद बतलानेवाले नागहस्ति श्रवणके उपदेशको प्रवाहमान बतलाया है। (पृ. ६६ और ७१-७२) २. उक्त दोनों आचार्योंका उपदेश प्रवाह्यमान होनेका प्रतिपादक वचन-तेसिं चेव भयवंताणमअमंखु-णागहत्थिणं पसहज्जतेणुवएसेण ..."। (पृ. २३ ) ___ यहाँ क्रोधादि चारों कषायोंके कालके अल्पबहुत्वको गतिमार्गणा और चौदह जीव समासोंमें बतलानेके प्रसंगसे उक्त वचन आया है । सो यहाँ चूर्णिसूत्रकारने गतिमार्गणा और चौदह जीव समासोंमें मात्र प्रवाह्यमान उपदेशका निर्देश किया है अप्रवाहमान उपदेशका नहीं। जयधवलाकारने भी चुणिसूत्रोंका अनुसरण क दोनों स्थानोंमें मात्र प्रवाह्यमान उपदेशका खुलासा करते हुए 'तेसिं चेव उपदेसेण चोद्दस-जीवसमासेहिं दंडगो भणिहिदि । (पृ. २३ ) इस चूर्णिसूत्रके व्याख्यानके प्रसंगसे उसमें आये हुए 'तेसिं चेव' इस पदका व्याख्यान करते हुए उक्त पदसे उक्त दोनों भगवन्तोंका ग्रहण किया है। ३. इस प्रकार उक्त दो प्रकारके उल्लेख तो ऐसे हैं जिनसे हमें उनमेंसे कौन उपदेश प्रवाहमान है और कौन उपदेश अप्रवाह्यमान है इस बातका पता लगनेके साथ जयधवला टीकासे उनके उपदेष्टा आचार्योंका भी पता लग जाता है। किन्तु चूणिसूत्रोंमें प्रवाहमान और अप्रवाहमानके भेदरूप कुछ ऐसे भी उपदेश संकलित हैं जिनके विषयमें जयधवलाकारको विशेष जानकारी नहीं थी। अतः जयधवलाकारने इनका स्पष्टीकरण तो किया है, परन्तु आचार्योंके नामोल्लेख पूर्वक उनका निर्देश नहीं किया। इससे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि इस विषयमें जयधवलाकारके समक्ष उपस्थित साहित्यमें उक्त प्रकारका विशेष निर्देश नहीं होगा, अतः उन्होंने दोनों उपदेशोंका स्पष्टीकरण मात्र करना उचित समझा। जयधवलाके आगे दिये जानेवाले इस उदाहरणसे यह स्पष्ट हो जाता है जो एसो अणंतरपरूविदो उवएसो सो पवाइज्जदे... .... .... .... । अपवाइज्जतेण पुण उवदेसेण केरिसी पयदपरूवणा होदित्ति एवंविहासंकाए णिण्णयकरणट्ठमुत्तरसुत्तमोइण्णं । (पृ.११६) इस उल्लेखमें दो प्रकारके उपदेशोंका निर्देश होते हुए भी चूर्णिकारकी दृष्टिमें उनके प्रवक्तारूपमें कौन प्रमुख आचार्य विवक्षित थे इसको आनुपूर्वीसे लिखित या मौखिक रूपमें सम्यक् अनुश्रुति प्राप्त न होनेके कारण जयधवलाकारने मात्र उनकी व्याख्या कर दी है। यह है जयधवलाकी व्याख्यानशैली। इसके टीकाकारको जिस विषयका किसी न किसी रूपमें आधार मिलता गया उसकी वे उसके साथ व्याख्या करते हैं और जिस विषयका आनुपूर्वीसे किसी प्रकारका आधार उपलब्ध नहीं हुआ उसको वे अनुश्रु तिके अनुसार ही व्याख्या करते हैं। टीकामें वे प्रामाणिकताको बराबर बनाये
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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