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________________ ३१४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० भावपदुप्पायणफलमणुत्तसिद्धं पि मंदबुद्धिसिस्सजणाणुग्गहणम्सुवइट्ठमिदि गहेयव्वं । (५०) अंतोमुहुत्तमद्ध सव्वोवसमेण होइ उवसंतो। तत्तो परमुदयो खलु तिण्णेकदरस्स कम्मस्स ॥१०३॥ २०४. एसा गाहा दंसणमोहणीयस्स सव्वोवसमेणावट्ठाणकालपमाणावहारणट्ठमागया । तं जहा–एत्थंतोमुहुत्तमद्धमिदि वुत्ते अंतरदीहत्तस्स संखेजदिमागमेत्तो कालो गहेयव्वो। कुदो एदमवगम्मदे ? पुव्वपरूविदप्पाबहुआदो । सव्वोवसमेणे त्ति के बन्धके अभावका कथन करना है जो अनुक्तसिद्ध है, फिर भी मन्दबुद्धि शिष्यजनोंका अनुग्रह करनेके लिये इसका उपदेश दिया है ऐसा ग्रहण करना चाहिए। विशेषार्थ-उक्त गाथासूत्र में किन जीवोंके दर्शनमोहनीयका बन्ध नहीं होता इसका निर्देश करते हुए बतलाया है कि सम्यग्मिथ्यादृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव दर्शनमोहनीयका बन्ध नहीं करता। तथा गाथासूत्र में आये हुए 'अपि' शब्द द्वारा यह भी सूचित किया है कि उपशमसम्यग्दृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि भी दर्शनमोहनीयका बन्ध नहीं करता । टीकामें इस सूत्रकी रचनाका एक प्रयोजन यह भी बतलाया है कि जिस प्रकार मिथ्यात्वके उदयसे मिथ्यादष्टि जीव मिथ्यात्वका बन्धक होता है उसीप्रकार क्या सम्यग्मिथ्यात्वके उदयसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सम्यग्मिथ्यात्वका और वेदकसम्यक्त्वके उदयसे वेदकसम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्वका बन्धक होता है या नहीं होता ऐसा प्रश्न होने पर उक्त गाथासूत्र इसका निषेध करनेके लिये आया है। तात्पर्य यह है उपशमसम्यक्त्वके कालमें ही सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वकी संक्रमद्वारा सत्ता प्राप्त होती है, अन्य भावके कालमें नहीं। अब यदि कोई यह प्रश्न करे कि जिस प्रकार मिथ्यात्वके उदयसे मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्वका बन्धक होता है उस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्व के उदयसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सम्यग्मिथ्यात्वका या सम्यक्त्वके उदयसे वेदकसम्यग्दृष्टि जीव सम्यक्त्वका संक्रामक (कर्मबन्धक ) होता है क्या ? तो इस प्रश्नका समाधान करनेके लिये उक्त गाथासूत्रमें यह कहा गया है कि सम्यग्मिध्यादष्टि जीव दर्शनमोहरूप सम्यग्मिथ्यात्वका अबन्धक है। उसी भी प्रकार वेदकसम्यग्दृष्टि जीव दर्शनमोहरूप सम्यक्त्वका अबन्धक है। क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव उक्त तीनों प्रकृतियोंका क्षय कर चुका है, इसलिए वह इनका अबन्धक होता ही है। फिर भी मन्दबुद्धि शिष्योंको ज्ञान करानेके लिये गाथासूत्र में इस विषयका अलगसे विधान किया है। . सभी दर्शनमोहनीय कर्मोका उदयाभावरूप उपशम होनेसे वे अन्तर्मुहूर्त काल तक उपशान्त रहते हैं। उसके बाद तीनोंमेंसे किसी एक कर्मका नियमसे उदय होता है ॥९-१०३॥ ६२०४. यह गाथा दर्शनमोहनीय कर्मके सर्वोपशमसे अवस्थान कालके प्रमाणका अवधारण करनेके लिये आई है। यथा-यहाँ गाथासूत्रमें 'अंतोमुहुत्तमद्धं' ऐसा कहने पर अन्तरायामका संख्यातवाँ भागप्रमाण काल लेना चाहिए। शंका-यह किस प्रमाणसे जाना जाता है ?
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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