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________________ गाथा ९७] दंसणमोहोवसामणा ३०३ पदुप्पादो दट्ठव्वो, तस्स वि वाघादभेदत्तादो । ' तहा णिरासाणो' त्ति भणिदे दंसणमोहणीयमुवसामंतो तदवत्थाए सासणगुणं पि ण एसो पडिवज्जदि त्ति भणिदं होइ । 'उवसंते भजियव्वो' उपशान्ते दर्शनमोहनीये भाज्यो विकल्प्यः, सासादन परिणामं कदाचिद् गच्छेन्न वेति । किं कारणं १ उवसमसम्मत्तद्धाए छावलियावसेसाए तदोपहुडि सासणगुणपडिवत्तीय केसु वि जीवेसु संभवदंसणादो । 'णीरासाणो य खीणम्मि' उवसमसम्मत्तद्धाए खीणाए सासादनगुणं णियमा ण पडिवज्जदि ति भणिदं होइ । कुदो एवं चे ! उवसमसम्मत्तद्धाए जहण्णेणेयसमयमेत्त सेसाए उकस्सेण छावलियमेतावसेसाए सासणगुणपरिणामो होइ, पण परदो त्ति नियमदंसणा दो । अथवा 'णीरासाणो य खीणम्मि' एवं भणिदे दंसणमोहणीयम्मि खीणम्मि णिरासाणो चेव, ण तत्थ सासणगुणपरिणाम संभवइ त्ति घेत्तव्वं, खइयस्स सम्मत्तस्सापडिवादिसरूवत्तादो, सासणपरिणामस्स उवसमसम्मत्त पुरं गमत्तणि यमदंसणादो च । व्याघातका एक भेद है । 'तहा णिरासाणो' ऐसा कहने पर दर्शनमोहका उपशम करनेवाला जीव उस अवस्थामें सासादन गुणस्थानको भी नहीं प्राप्त होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । 'उवसंते भजियव्वो' अर्थात् दर्शनमोहके उपशान्त होने पर भाज्य है - विकल्प्य है अर्थात् वह जीव कदाचित् सासादन गुणस्थानको प्राप्त होता है और कदाचित् प्राप्त नहीं होता, क्योंकि उपशम सम्यक्त्वके काल में छह आवलि शेष रहने पर वहाँसे लेकर सासादन गुणस्थानकी प्राप्ति किन्हीं भी जीवोंमें सम्भव देखी जाती है । 'णीरासाणो य खीणम्मि' अर्थात् उपशम सम्यक्त्वका काल क्षीण होने पर यह जीव सासादन गुणस्थानको नियमसे नहीं प्राप्त होता यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- ऐसा किस कारण से है ? समाधान — क्योंकि उपशम सम्यक्त्वके कालमें जघन्यरूपसे एक समय शेष रहने पर और उत्कृष्टरूपसे छह आवलि काल शेष रहने पर सासादनगुणस्थान परिणाम होता है, इसके बाद नहीं ऐसा नियम देखा जाता है । अथवा 'णीरासाणो य खीणम्मि' ऐसा कहनेपर दर्शनमोहनीयका क्षय होनेपर यह जीव निरासान ही है, क्योंकि उसके सासादन गुणस्थानरूप परिणाम सम्भव नहीं है ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। कारण कि क्षायिक सम्यक्त्व अप्रतिपातस्वरूप होता है और सासादन परिणामके उपशम सम्यक्त्व पूर्वक होने का नियम देखा जाता है । विशेषार्थ – यहाँ दर्शनमोहके उपशामन विधिके प्रारम्भ होनेके समय से लेकर उपशम सम्यक्त्वके कालके भीतर तथा उसके बाद किन कार्य विशेषका होना सम्भव है और कौन कार्यविशेष होते ही नहीं इन सब बातोंका इस गाथामें निर्देश किया गया है । यह जीव दर्शनमोहकी उपशामन विधिका प्रारम्भ अधःकरणके प्रथम समयसे करके अनिवृत्तिकरणके अन्तिम समय में उसको पूर्ण करता है। इस कालके भीतर एक तो यह जीव देव, मनुष्य, तिर्योंद्वारा और अन्य कारणोंसे उपस्थित हुए उपसर्गोंके युगपत् या किसी एकके उपस्थित होनेपर उस ( उपशामन विधि ) से च्युत नहीं होता । यहाँ तक कि ऐसे जीवका
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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