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________________ ३०१ गाथा ९७ ] दसणमोहोवसामणा बाह्य साधन नहीं है । किन्तु जिनका ऐसा उपयोग होता है कि यह वेदना इस मिथ्यात्व तथा असंयमके सेवनसे उत्पन्न हुई है उनके वह वेदना सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका साधन होता है। अन्तके चार नरकोंमें मात्र जाति-स्मरण और वेदनाभिभव ये दोही प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके बाह्य साधन हैं । यहाँ सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका बाह्य साधन धर्मश्रवण सम्भव नहीं, क्योंकि इन नरकोंमें एक तो देवोंका गमनागमन नहीं होता । दूसरे वहाँके नारकियोंमें भवके सम्बन्धवश या पूर्वके वैरवश परस्परमें अनुग्राह्य-अनुग्राहक भाव नहीं पाया जाता । अतः वहाँ उक्त दो ही प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके निमित्त हैं।' तिर्यञ्चोंमें प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके बाह्य साधन तीन हैं-जातिस्मरण, धर्मश्रवण और जिनबिम्बदर्शन । ये ही तीन मनुष्योंमें प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके बाह्य साधन हैं। किन्हीं मनुष्योंको जिन महिमा देखकर प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है। पर इसे अलगसे चौथा साधन माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसका जिनबिम्बदर्शनमें अन्तर्भाव हो जाता है। कदाचित् किन्हीं मनुष्योंको लब्धिसम्पन्न ऋषियोंके देखनेसे भी प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है। पर इसे भी अलगसे साधन माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसका भी जिन बिम्बदर्शनमें अन्तर्भाव हो जाता है। सम्मेदाचल, गिरनार, चम्पापुर औह पावापुर आदिका दर्शन भी जिनबिम्बदर्शनमें ही गर्भित है, क्योंकि वहाँ भी जिनबिम्बदर्शन तथा मुक्तिगमनसम्बन्धी कथाका सुनना या कहना आदिके बिना प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्ति नहीं होती। देवोंमें भी भवनवासी, वानव्यन्तर,ज्योतिषी और बारहवें कल्पतकके कल्पवासी देवोंमें प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके चार मुख्य साधन हैं-जातिस्मरण, धर्मश्रवण, जिनमहिमा दर्शन और देवर्धिदर्शन । जिनमहिमादर्शन जिनबिम्बदर्शनके बिना बन नहीं सकता, इसलिए जिनमहिमादर्शनमें ही वह गर्भित है। यद्यपि जिनमहिमादर्शनमें स्वर्गावतरण और जन्माभिषेक आदि गर्भित हैं, पर इनमें जिनबिम्बदर्शन नहीं होता, इसलिए यह कहा जा सकता है कि जिनमहिमादर्शनके साथ जिनबिम्बदर्शनका अविनाभाव नहीं है सो ऐसा कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि वहाँ भी ये आगामी कालमें साक्षात् जिन होनेवाले हैं ऐसा बुद्धिमें स्वीकार करके ही उक्त कल्याणक किये जाते हैं, अतः इन कल्याणकोंमें भी जिनबिम्बदर्शन बन जाता है। अथवा ऐसे कल्याणकोंको निमित्तकर जो प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न होता है उसे जिनगुणश्रवणनिमित्तक समझना चाहिए । देवर्धिदर्शन जातिस्मरणसे भिन्न साधन है, क्योंकि अपनी-अपनी अणिमादि ऋद्धियोंको देखकर ऐसा विचार होना कि ये ऋद्धियाँ जिनदेवद्वारा उपदिष्ट धार्मिक अनुष्ठानके फलस्वरूप उत्पन्न हुई हैं, जातिस्मरणस्वरूप होनेसे इसको निमित्तकर उत्पन्न हुआ प्रथम सम्यक्त्व जातिस्मरणनिमित्तक है और ऊपरके देवोंकी महा ऋद्धियोंको देखकर जो ऐसा विचार करता है कि इन देवोंके ये ऋद्धियां सम्यग्दर्शनसे युक्त संयमधारणके फलस्वरूप उत्पन्न हुई हैं और मैं सम्यग्दर्शनसे रहित द्रव्यसंयम पालकर वाहन आदि नीच देवोंमें उत्पन्न हुआ हूँ उस जीवके ऊपरके देवोंकी ऋद्धिको देखकर उत्पन्न हुए प्रतिबोधसे जो प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्ति होती है वह देवर्धिदर्शननिमित्तक प्रथम सम्यक्त्व है। इसप्रकार जातिस्मरण और देवर्धिदर्शन इन दोनोंमें अन्तर है। दूसरे जातिस्मरण देवोंमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर ही होता है और देवधिदर्शन कालान्तरमें होता है, इसलिये भी इन दोनोंमें अन्तर है। आनत कल्पसे लेकर अच्युत कल्प तकके देवोंमें देवधिदर्शनको छोड़कर प्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके पूर्वोक्त तीन साधन हैं। एक तो इन देवोंमें ऊपरके महर्धिक देवोंका आगमन नहीं होता। दूसरे वहींके देवोंकी
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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