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________________ गाथा ९४ ] दंसणमोहोवसामणा २८९ सीसयंमिच्छत्तस्से त्ति विसेसियूण सुत्ते ण परूविदं, किंतु सामण्णेणोवइट्ठ, तेण सेसकम्माणं पढमसमय उवसामगस्स गुणसेढिसीसयं गहेयव्वं, तेसिमंतरकरणाभावेण पढमसमयउवसामगम्मि तस्संभवे विरोहाणुवलंभादो । १० । * पढमट्ठिदी संखेज्जगुणा । $ १७६. किं कारणं ? पढमट्ठिदीए संखेजदिभागमेत्तस्सेव गुणसेढिसीसयस्स अंतरदुमागाइदत्तादो । ११ । * उवसामगद्धा विसेसाहिया । $ १७७, केत्तियमेत्तो विसेसो ! समयूणदोआवलियमेत्तो । किं कारणं ? चरिम इसलिये प्रथम समयवर्ती उपशामकके जो शेष कर्म हैं उनका गुणश्रेणिशीर्ष लेना चाहिए, क्योंकि उन कर्मों का अन्तरकरण न होनेसे प्रथम समयवर्ती उपशामकके उसके सम्भव होनेमें विरोध नहीं पाया जाता । १० । - विशेषार्थ – यहाँ चूर्णिसूत्र में 'पढमसमय व सामगस्स गुणसेढिसीसयं' ऐसा कहा है । इसलिये प्रश्न होता है कि यहाँ पर किस गुणश्रेणिशीर्षका ग्रहण किया है ? क्या मिध्यात्वकर्मगुणश्रेणिशीर्षका या शेष कर्मोंके गुणश्रेणिशीर्षका ? यदि मिध्यात्वका गुणश्रेणिशीर्ष लिया जाता है तो जिस समय यह जीव उपशमसम्यदृष्टि होता है उसके प्रथम समय में तो मिथ्यात्वगुणश्रेणिशीर्ष बनता नहीं, क्योंकि उसका पतन अन्तरकरणके समय अन्तर सम्बन्धी अन्तिम फलिके पतनके साथ हो जाता है । इसलिये मिथ्यात्वका गुणश्रेणिशीर्ष यदि लेना ही है तो भावी भूतका उपचार करके जो प्रथम समय अन्तर करनेवाला है उसे यहाँ प्रथम समयवर्ती उपशामकरूपसे ग्रहण करना चाहिए । ऐसे जीवके मिध्यात्वका गुणश्रेणिशीर्ष पाया जाता है और वह उपशमसम्यग्दृष्टिके गुणसंक्रमकालसे संख्यातगुणा है । किन्तु यहाँ सूत्र में मिथ्यात्वका गुणश्रेणिशीर्ष ऐसा नहीं कहा है । ऐसी अवस्था में जो प्रथम समयवर्ती उपशामक है उसके शेष कर्मोंका गुणश्रेणिशीर्ष लिया जा सकता है । इसप्रकार सूत्रोक्त पदोंके ये दोनों अर्थ करने में संगति बैठ जाती है, क्योंकि अन्तरकरणके प्रथम समय में मिथ्यात्व के गुणश्रेणिशीर्षका जो प्रमाण है वही प्रमाण प्रथम समयवर्ती उपशामक के शेष कर्मोंके गुणश्रेणिशीर्षका है, क्योंकि यहाँ गलितावशेष गुणश्रेणि होती है, इसलिये उक्त दोनों स्थलोंमें दोनों गुणश्रेणिशीर्षोंके समान होने में कोई बाधा नहीं आती । * उससे प्रथम स्थिति संख्यातगुणी है । $ १७६. क्योंकि प्रथम स्थितिके संख्यातवें भागप्रमाण हो गुणश्रेणिशीर्षको अन्तर के लिये ग्रहण किया गया है । ११ । * उससे उपशामकका काल विशेष अधिक है । $ १७७. शंका - विशेषका प्रमाण कितना है ? समाधान - एक समय कम दो आवलिकाल विशेषका प्रमाण है । शंका- इसका क्या कारण है ? ३७
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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