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________________ ૨૮૮ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगदारं १० * अव्वकरणे हिदिखंडयउक्कीरणद्धा हिदिबंधगद्धा च दो वि तुल्लाओ विसेसाहियाओ। १७३. किं कारणं ? पुग्विन्लदोकालेहितो तत्तो हेट्ठा अंतोमुहुत्तमोसरिय अपुव्वकरणषढमट्ठिदिखंडयविसए एदासि पन्चुत्तिदंसणादो । ८। __* उवसामगो जाव गुणसंकमेण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणि पूरेदि सो कालो संखेजगुणो। __ १७४. किं कारणं ? तकालब्भंतरे संखेजाणं डिदिखण्डयाणं द्विदिबंधाणं च संभवादो। * पढमसमयउवसामगस्स गुणसेढिसीसयं संखेजगुणं । • ६१७५. एत्य पढमसमयउवसामगो त्ति भणिदे भाविनि भूतवदुपचारं कृत्वा पढमसमयउवसामगमाविस्स पढमसमयअंतरकारयस्स गहणं कायव्वं । तस्स गुणसेढिसीसगमिदि वुत्ते अंतरचरिमफालीए पदमाणियाए गुणसेढिणिक्खेवस्स अग्गग्गादो संखेजदिमागं खंडेयण जं फालीए सह णिल्लेविज्जमाणं गुणसेढिसीसयं तस्स गहणं कायव्वं । तं पुण पुस्विल्लादो गुणसंकमकालादो संखेज्जगुणं, गुणसेढिसीसयस्स संखेज्जदिमागे वेव गुणसंकमकालस्स पज्जवसाणदंसणादो। अधवा पढमसमयउवसामगस्स गुणसेढि * उनसे अपूर्वकरणमें स्थितिकाण्डकका उत्कीरणकाल और स्थितिबन्धकाल ये दोनों ही परस्पर तुल्य होकर विशेष अधिक हैं। ६ १७३. क्योंकि पूर्वोक्त दो कालोंसे उनसे नीचे अन्तर्मुहूर्त काल पीछे जाकर अपूर्वकरणके प्रथम स्थितिकाण्डकके समय इनकी प्रवृत्ति देखी जाती है । ७८ । * उन दोनोंसे उपशामक जीव जब तक गुणसंक्रमके द्वारा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियोंको पूरता है वह काल संख्यातगुणा है। 5 १७४. क्योंकि उस कालके भीतर संख्यात स्थितिकाण्डक और स्थितिबन्ध सम्भव हैं।९। * उससे प्रथम समयवर्ती उपशामकका गुणश्रेणिशीर्षे संख्यातगुणा है । $ १७५. यहाँ पर 'प्रथम समयवर्ती उपशामक' ऐसा कहने पर भावोंमें भूतके समान उपचार करके प्रथम समयवर्ती उपशामक होनेवालेका अर्थात् प्रथम समयवर्ती अन्तर करनेवालेका ग्रहण करना चाहिए। उसका गुणश्रेणिशीर्ष ऐसा कहनेपर अन्तरसम्बन्धी अन्तिम फालिका पतन होते समय गुणश्रेणिनिक्षेपके अग्रामसे संख्यातवें भागका खण्डन कर जो फालिके साथ निर्जीर्ण होनेवाला गुणाश्रेणिशीर्ष है . उसका ग्रहण करना चाहिए। वह पूर्वके गुणसंक्रमसम्बन्धी कालसे संख्यातगुणा है, क्योंकि गुणश्रेणिशीर्षके संख्यातवें भागमें ही गुणसंक्रमकालका अन्त देखा जाता है। अथवा सूत्रोंमें प्रथम समयवर्ती उपशामकसम्बन्धी मिथ्यात्वका गुणश्रेणिशीर्ष ऐसा विशेषण लगा कर नहीं कहा, किन्तु सामान्यरूपसे कहा है,
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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