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________________ ૨૮૪ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० $ १६४. एवमेदेण विधिणा अंतोमुहुत्तकालं गुणसंकमणुपालिय तदो गुणसंकमकालपरिसमत्तीए मिच्छत्तस्स विज्झादसंकममाढवेदि ति पदुष्पाय णमुत्तरमुत्तारंभो -- * तत्तो परमंगुलस्स असंखेज्जदिभागपडिभागेण संकमेदि सो विज्झादसंकमो णाम । $ १६५. पुब्विल्लो उवसमसम्माइट्ठी पढमसमय पहुडि एगंताणुवडीए वड्ढमाणस्स अंतोमुहुत्तकालभाविओ गुणसंकमो णाम । एतो परमंगुलस्स असंखेजदिभागपडिभागिओ विज्झादसणिदो संकमविसेसो गुणसंकमपरिसमत्तिसमकालपारंभो होदूण जाव उवसमसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी च ताव णिप्पडिबंधं पयदृदि ति भणिदं होदि । कुदो वुण दस विज्झादसण्णा तिचे १ विज्झादविसेहियस्स जीवस्स ट्ठिदि-अणुभागखंडय - गुणसे ढिआदिपरिणामेसु थक्केसु पयट्टमाणत्तादो विज्झादसंकमो त्ति एसो भण्णदे । एवं सम्मामिच्छत्तस्स वि एदम्मि विसए विज्झादसंकमपवृत्ती वक्खाणेयव्वा । उत्तरोत्तर गुणित क्रमसे असंख्यातगुणे द्रव्यका निक्षेप होता है यह बतलाने के साथ यह भी बतलाया है कि उपशमसम्यग्दृष्टिके दूसरे समय से लेकर सम्यग्मिथ्यात्व के द्रव्यका भी गुणसंक्रम होता है, क्योंकि सूच्यंगुलके असंख्यातवें भागका सम्यग्मिथ्यात्वके द्रव्य में भाग देनेपर जो लब्ध आवे उतने द्रव्यका विध्यात- गुणसंक्रम द्वारा सम्यग्मिथ्यात्वके द्रव्यका सम्यक्त्व में उस अवस्थामें संक्रमण होता रहता है। यह द्रव्य सम्यक्त्वमें प्रति समय गुणितक्रमसे प्राप्त होता है, इसलिए यहाँ ऐसे संक्रमका नाम बिध्यात संक्रम होते हुए भी उसे टीकाकारने गुणसंक्रम कहा है ऐसा प्रतीत होता है। श्री धवलाजीके इसी स्थलपर इसका कोई उल्लेख उपलब्ध नहीं होता । $ १६४. इस प्रकार इस विधिसे अन्तर्मुहूर्त काल तक गुणसंक्रमका पालनकर इसके आगे गुणसंक्रमका काल समाप्त होनेपर मिथ्यात्वकर्मका विध्यातसंक्रम आरम्भ करता है इसका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रका आरम्भ करते हैं * उससे आगे सूच्यंगुलके असंख्यातवें भागरूप प्रतिभागके द्वारा संक्रमण करता है वह विध्यातसंक्रम है । $ १६५. जो पहलेका उपशमसम्यग्दृष्टि जीव प्रथम समयसे लेकर एकान्तानुवृद्धिसे वृद्धि प्राप्त हो रहा है उसके अन्तर्मुहूर्त कालतक होनेवाला संक्रम गुणसंक्रम कहलाता है । इससे आगे सून्यंगुलके असंख्यातवें भागरूप भागहारस्वरूप विध्यातसंज्ञावाला संक्रमविशेष गुणसंक्रमकी समाप्ति समकाल में प्रारम्भ होकर जबतक उपशमसम्यग्दृष्टि और बेदकसम्यदृष्टि है तब तक बिना किसी प्रतिबन्ध के प्रवृत्त रहता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । शंका- -इस संक्रमकी विध्यात संज्ञा किस कारणसे है ? समाधान -- विध्यात हुई है विशुद्धि जिसकी ऐसे जीवके स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक और गुणश्रेणि आदि परिणामोंके रुक जानेपर प्रवृत्त होनेके कारण इसे विध्यातसंक्रम कहते हैं ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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