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________________ गाथा ९४] दसणमोहोवसामणा - २८१ णीयस्स उदयपञ्जाएण विणा अवट्ठाणमुवसमो त्ति भण्णदे । ण सव्वोवसमो एत्थ संभवइ, उवसंतस्स वि दंसणमोहणीयस्स संकमोकडणाकरणाणमुवलब्मदे। तम्हा अंतरपवेसपढमसमए चेव दंसणमोहणीयमुवसामिय उवसमसम्माइट्ठी जादो त्ति सिद्धो सुत्तस्स समुच्चयत्थो । संपहि तम्हि चेव पढमसमए कीरमाणकजभेदपदुप्पायणमुत्तरसुत्तावयारो-- ...* ताधे चेव तिण्णि कम्मंसा उप्पादिदा। १६०. तम्हि चेव उवसंतदसणमोहणीयपढमसमए तिण्णि कम्मंसा उप्पादिदा। के ते ? मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तसण्णिदा । कुदो एवमेदेसिमुप्पत्ती चे १ ण, अणियट्टिकरणपरिणामेहिं पेलिज्जमाणस्स देसणमोहणीयस्स जंतेण दलिजमाणकोदवरासिस्सेव तिण्हं भेदाणमुप्पत्तीए विरोहाभावादो। 5 १६१. संपहि उवसमसम्माइटिपढमसमयप्पहुडि मिच्छत्तपदेसाणं सम्मत्तसम्मामिच्छत्तेसु गुणसंकमेण परिणमणक्कममप्पाबहुअमुहेण परूवेमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ ___यहाँपर सर्वोपशम सम्भव नहीं है, क्योंकि उपशमपनेको प्राप्त होनेपर भी दर्शनमोहनीयके संक्रमकरण और अपकर्षणकरण पाये जाते है। इसलिए अन्तरमें प्रवेश करनेके प्रथम समयमें ही दर्शनमोहनीयको उपशमाकर उपशमसम्यग्दृष्टि हो गया इसप्रकार सूत्रका समुच्चयरूप अर्थ सिद्ध हुआ। अब उसी प्रथम समयमें किये जानेवाले कार्यभेदका कथन करनेके लिये आगेके सूत्रका अवतार करते हैं * उसी समय वह मिथ्यात्वकर्मके तीन खण्ड उत्पन्न करता है। 5 १६०. उसी उपशान्त-दर्शनमोहनीयके प्रथम समयमें तीन कर्मभेद उत्पन्न करता है। शंका-वे कौनसे ? समाधान-सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और मिथ्यात्व संज्ञावाले। शंका-इनकी इसप्रकार उत्पत्ति कैसे होती है ? समाधान-नहीं, क्योंकि जैसे यन्त्रसे कोदोंके दलनेपर उनके तीन भाग हो जाते हैं वैसे ही अनिवृत्तिकरणपरिणामोंके द्वारा दलित किये गये दर्शनमोहनीयके तीन भेदोंकी उत्पत्ति होने में बिरोधका अभाव है। विशेषार्थ--चक्की आदि यन्त्रसे कोदोंके दलनेपर उनके चावल, कण और तुष ऐसे तीन भाग हो जाते हैं वैसे ही अनिवृत्तिकरणरूप परिणामोंसे मिथ्यात्वकर्मको निःशक्त करके जिस समय यह जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करता है उसी समय मिथ्यात्वकर्मके तीन टुकड़े हो जाते हैं-सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और मिथ्यात्व। 5 १६१. अब. उपशमसम्यग्दृष्टि जीवके प्रथम समयसे लेकर मिथ्यात्वकर्मके प्रदेशोंके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वमें गुणसंक्रमद्वारा परिणमनके क्रमको अल्पबहुत्वद्वारा कथन करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं ३६
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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