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________________ २७६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगदारं १० * तदो प्पहुडि उवसामगो त्ति भण्णइ। १५१ जइ वि एसो पुव्वं पि अधापक्तकरणपढमसमयप्पहुडि उवसामगो चेव तो वि एत्तो पाए विसेसदो चेव उवसामगो होइ नि भणिदं होइ । एदेण 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहि' ति एदिस्से पुच्छाए अत्थणिण्णओ को दट्टयो, अणियट्टिअद्धाए संखेज्जेसु भागेसु गदेसु संखेज्जदिमागसेसे अंतरं कादूण तदो दंसणमोहणीयस्स पयडि-द्विदि-अणुभाग-पदेसाणमुवसामगो होइ ति परूवणावलंबणादो । एवमंतरकरणाणंतरसुवसामगववएसं लद्ध ण मिच्छतमुवसामेमाणस्स मिच्छत्तपढमद्विदिवेदगावत्थाए हेट्ठिमपरूवणादो पत्थि गाणगं । णवरि पढमहिदीए समयूणादिकमेणोहट्टमाणीए जाधे आवलिय-पडिआवलियाओ सेसाओ ताधे को विसेसो अस्थि चि पदुप्पायणट्ठमुवरिमो सुचपबंधो * पढमहिदीदो वि विदियट्ठिदीदो वि आगाल-पडिआगालो ताव जाव आवलिय-पडिआवलियाओ सेसाओ त्ति । के बहुभागको बिता कर एक भागके शेष रहने पर स्थितिबन्धके कालप्रमाण काल द्वारा मात्र मिथ्यात्वका अन्तरकरण करता हुआ प्रारम्भमें अन्तरके नीचे प्रथम स्थितिको अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थापित करता है। किन्तु यदि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्तावाला सादि मिथ्यादृष्टि जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्वको उत्पन्न करता है तो वह नीचे एक आवलिप्रमाण प्रथम स्थितिको स्थापित कर ऊपर मिथ्यात्वकी जहाँ तककी स्थितिका अन्तरकरण करता है वहाँ तककी इन दोनों कर्मोंकी स्थितिका भी अन्तरकरण करता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * वहाँसे लेकर यह जीव उपशामक कहलाता है । $ १५१. यद्यपि यह जीव पहले ही अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयसे लेकर उपशामक ही है तो भी यहाँसे लेकर यह विशेषरूपसे ही उपशामक होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इस प्रकार इतने कथन द्वारा 'अंतरं वा कहिं किच्चा के के उवसामगो कहिं' इस पृच्छाके अर्थका निर्णय किया हुआ जानना चाहिए, क्योंकि प्रकृतमें अनिवृत्तिकरणके कालके संख्यात बहुभागोंके जाने पर तथा संख्यातवें भागके शेष रहने पर अन्तरको करके वहाँसे लेकर दर्शन मोहनीयकी प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशोंका उपशामक होता है इस प्रकारकी प्ररूपणाका अवलम्बन लिया है। इस प्रकार अन्तरकरणके अनन्तर उपशामक संज्ञाको प्राप्त कर मिथ्यात्वकी उपशामना करनेवाले जीवके मिथ्यात्वकी प्रथम स्थितिके वेदन करनेरूप अवस्थामें अधस्तन प्ररूपणासे कोई भेद नहीं है । इतनी विशेषता है कि प्रथम स्थितिके एक समय कम आदिके क्रमसे गलित होती जाने पर जब आवलि-प्रतिआवलि शेष रहती हैं तब क्या विशेषता है इसका कथन करनेके लिये उपरिमसूत्र प्रबन्ध है * प्रथम स्थितिसे भी और द्वितीय स्थितिसे भी तब तक आगाल-प्रत्यागाल होते रहते हैं जब तक आवलि-प्रत्यावलि शेष रहती हैं।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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