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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० $ १११. किं कारणं ? असंखेज्जलोगमेत्ताणि छट्टाणाणि अंतरिदूणेदिस्से समुपपत्तिअब्भुवगमादो । २५४ * तत्थेव उक्कस्सिया विसोही अनंतगुणा । $ ११२. तत्थेवापुष्वकरणविदियसमए जा उक्कस्सिया विसोही सा अणंतरपरूविदजहण विसोहीदो अनंतगुणा त्ति भणिदं होइ । एत्थ वि कारणं पुव्वं व वत्तव्वं । * समये समये असंखेज्जा लोगा परिणामट्ठाणाणि । ६ ११३. अपुव्वकरणद्धाए सव्वत्थ समयं पडि असंखेज्जलोगमेत्ताणि परिणामद्वाणाणि देणप्पा बहुअविहिणा अवट्टिदा त्ति भणिदं होइ । * एवं णिव्वग्गणा च । $ ११४. जत्तियमद्धाणमुवरि गंतूण णिरुद्धसमयपरिणामाणमणुकट्टी वोच्छिदि तमेव णिव्वग्गणकंडयं णाम । एत्थ पुण समये समये चेव णिव्वग्गणकंडयं घेत्तव्वं, विवक्खिय समयपरिणामाणमुवरि एगम्मि वि समए संभवाणुवलंभादो त्ति एसो एदस्स सुत्तस्स भावत्थो । * एवं अपुव्यकरणस्स लक्खणं । $ ११५. एदमणंतरपरूविदं समए समए अणुकट्टि वोच्छेदलक्खणमपुव्वकरणलक्खणमवहारेयव्वमिदि वृत्तं होइ । $ १११. क्योंकि असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थानोंके अन्तरसे इसकी उत्पत्ति स्वीकार गई है। * वहीं पर उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है । $ ११२. वहीं पर अर्थात् अपूर्वकरणके दूसरे समयमें जो उत्कृष्ट विशुद्धि होती है वह अनन्तरपूर्व कही गई जघन्य विशुद्धिसे अनन्तगुणी है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । यहाँ पर भी कारणका कथन पहलेके समान करना चाहिए । * प्रत्येक समय में असंख्यात लोकप्रमाण परिणामस्थान होते हैं । $ ११३. अपूर्वकरणके कालमें सर्वत्र प्रत्येक समयमें असंख्यात लोकप्रमाण परिणामस्थान होते हैं यह बात इस अल्पबहुत्व के द्वारा निश्चित होती है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । * और इसी प्रकार प्रत्येक समय में निर्वर्गणा होती है । $ ११४. जितने स्थान ऊपर जाकर विवक्षित समयके परिणामोंको अनुकृष्टिका विच्छेद होता है उसीका नाम निर्वर्गणाकाण्डक है । परन्तु यहाँ अपूर्वकरणके प्रत्येक समय में निर्वर्गणाकाण्डकको ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि विवक्षित समयके परिणाम ऊपरके एक भी समयमें सम्भव नहीं हैं यह इस सूत्र का भावार्थ है । * यह अपूर्वकरणका लक्षण है । $ ११५ अनन्तर पूर्व कहा गया यह प्रत्येक समय में अनुकृष्टिका विच्छेदस्वरूप अपूर्वकरणका लक्षण जानना चाहिए यह उक्त कथनका तात्पर्य है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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