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________________ २४६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ सम्मत्ताणियोगद्दारं १० ६ ९७. संपहि एत्तो उवरि किंचि णाणत्तमत्थि त्ति तप्पदुप्पायणट्ठमिदमाह* तदो पढमसमए उक्कस्सिया विसोही अणंतगुणा। $ ९८. किं कारणं ? पुबिल्लजहण्णविसोही णाम अधापवत्तकरणपढमसमयविसोहिट्ठाणाणं चरिमखंडस्सादिविसोही । एसा वुण तत्थेवुक्कस्सविसोही, तत्तो असंखेजलोगमेत्तपरिणामट्ठाणाणि छट्ठाणवड्डिदसरुवाणि वोलिय समवद्विदा । तदो पुचिल्लजहण्णविसोहीदो एसा अणंतगुणा जादा । * जम्हि जहणिया विसोही णिट्ठिदा तदो उवरिमसमए जहणिया विसोही अणंतगुणा। की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । दूसरे समयको जघन्य विशुद्धिसे तीसरे समयकी जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है तथा तीसरे समयकी जघन्य विशुद्धिसे चौथे समयकी जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणी है । इस प्रकार निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समय तक पूर्व-पूर्वके समयकी जघन्य विशुद्धिसे अगले-अगले समयकी जघन्य विशुद्धि उत्तरोत्तर अनन्तगुणी जाननी चाहिए यह उक्त सूत्रका तात्पर्य है । अंकसंदृष्टिकी अपेक्षा यहाँ निर्वर्गणाकाण्डकका प्रमाण ४ है । निर्वर्गणाकाण्डकको प्रत्येक समयकी यह जघन्य विशुद्धि अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयके प्रथमादि खण्डगत जघन्य विशुद्धियोंके सदृश होनेसे निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समय तक इसका जघन्यपना देखा जाता है यह उक्त अंकसदृष्टिसे भले प्रकार ज्ञात होता है। $ ९७. अब इससे ऊपर कुछ नानात्व है उसका कथन करनेके लिये इस सूत्रको कहते हैं * उससे प्रथम समयमें उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है। $ ९८. क्योंकि इससे समनन्तर पूर्व जो जघन्य विशुद्धि बतला आये हैं वह तो अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयके विशुद्धिस्थानोंके अन्तिम खण्डकी आदिकी विशुद्धि है और यह ( प्रकृत सूत्र निर्दिष्ट ) वहींपर उत्कृष्ट विशुद्धि है जो उक्त जघन्य विशुद्धिसे छह स्थान क्रमसे वृद्धिरूप असंख्यात लोकप्रमाण परिणामस्थानोंको उल्लंघनकर अवस्थित है, इसलिए अनन्तर पूर्वकी जघन्य विशुद्धिसे यह अनन्तगुणी हो गई है। विशेषार्थ-प्रथम निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धि और अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयके अन्तिम खण्डकी जघन्य विशुद्धि सदृश है यह समनन्तर पूर्व ही बतला आये हैं । यहाँ प्रथम निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयके अन्तिम खण्डकी उत्कृष्ट विशुद्धिको जो अनन्तगुणा बतलाया है सो इससे उसी खण्डकी उत्कृष्ट विशुद्धि लेनी चाहिए, क्योंकि प्रथम निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयसम्बन्धी अन्तिम खण्डकी उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी होना युक्तियुक्त है। अंकसंदृष्टिकी अपेक्षा अधःप्रवृत्तकरणके प्रथम समयका अन्तिम खण्ड ४२ अंक प्रमाण है। चौथे समयके प्रथम खण्डका भी यही प्रमाण है । अतः स्पष्ट है कि प्रथम निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिम समयकी जघन्य विशुद्धिसे प्रथम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणी है। * पूर्वमें जहाँ जघन्य विशुद्धि समाप्त हुई है उससे उपरिम समयमें जघन्य विशुद्धि (प्रथम समयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे) अनन्तगुणी है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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