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________________ २१० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [सम्मत्ताणियोगद्दारं १० ३०. पसत्थाणं पि पयडीणं सादावेदणीय-मणुसग्गइ-देवगइ-पंचिंदियजादिओरालियसरीर-वेउन्विय०-तेजा-कम्मइयसरीर-तेसिं चेव बंधण-संघाद-समचउरससंद्वाणओरालिय - वेउव्यियअंगोवंग-बअरिसहसंघडण-पसत्थवण्णादिचउक्क -मणुस०-देवगइपाओग्गाणुपुस्वि-अगुरुअलहुअ - परघादुस्सास-आदावुजोव - पसत्थविहायगइ - तस-बादरपज्जत्त-पत्तेयसरीर-थिर-सुभ-सुभग-सुस्सर-आदेज्ज-जसगित्ति-णिमिण - उच्चागोदाणमेदेसि चउट्ठाणाणुभागसंतकम्मिओ । पदेससंतकम्म पि जासिं पयडीणं पयडिसंतकम्ममत्थि तासिमजहण्णाणुक्कस्सयं पदेससंतकम्मं भाणियव्वं । $३१. एवं ताव विदियगाहाए पढमावयवमस्सियूण पयडि-द्विदि-अणुभाग-पदेससंतकम्मणिरूवणं कादूण संपहि पयडियादिबंधसरूवावहारणहूँ गाहाए विदियावयवमवलंबिय परूवणं कुणमाणो चुण्णिसुत्तयारो इदमाह * के वा अंसे णिबंधदि त्ति विहासा। 5 ३२. सुगममेदं । जानना चाहिए । विशुद्धिवश इसके त्रिस्थानीय और चतु:स्थानीय अनुभागका घात हो जाता है यह उक्त कथनका तात्पर्ब है। $३० सातावेदनीय, मनुष्यगति, देवगति, पञ्चन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर तैजसशरीर, कार्मणशरीर, तथा उन्हींके बन्धन और संघात, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिक शरीर आगोपांग, वैक्रियिक शरीर आंगोपांग, वज्रऋषभनाराचसंहनन, प्रशस्त वर्णादि चार, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन प्रशस्त प्रकृतियोंके चतुःस्थानीय अनुभागसत्कर्मवाला होता है। प्रदेशसत्कर्म भी जिन प्रकृतियोंका इसके प्रकृतिसत्कर्म है उनका अजघन्य-अनुत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म कहना चाहिए। विशेषार्थ--यहाँ पर प्रथम सम्यक्त्वके सन्मुख हुए जीवके सत्तामें स्थित प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग चतुःस्थानीय बतलाया है। इसका कारण यह है कि इन प्रशस्त प्रकृतियोंके अनुभागका विशुद्धिवश घात नहीं होता, किन्तु प्रति समय विशुद्धिको वृद्धि होनेसे उक्त प्रकृतियोंके अनुभागकी प्रति समय अनन्तनुणी वृद्धि देखी जाती है। ऐसा जीव न तो उत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्मका स्वामी है और न ही जघन्य प्रदेशसत्कर्मका स्वामी है, इसलिये इसके जितनी प्रकृतियोंकी सत्ता है उनका अजघन्य-अनुत्कृष्ट प्रदेशसत्कर्म होता है यह स्पष्ट ही है । ३१. इस प्रकार सर्व प्रथम दूसरी गाथाके प्रथम अवयवके आश्रयसे प्रकृतिसत्कर्म, स्थितिसतर्म, अनुभागसत्कर्म और प्रदेशसत्कर्मका कथन कर अब प्रकृतिबन्ध आदि बन्धस्वरूपका निश्चय करनेके लिये गाथाके दूसरे अवयवका अवलम्बन लेकर कथन करते हुए चूर्णिसूत्रकार इस सूत्रको कहते हैं * प्रथम सम्यक्त्वके सन्मुख हुआ जीव किन कर्माशोंका बन्ध करता है इस पदकी विभाषा । ३२. यह सूत्र सुगम है।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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