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________________ १८९ गाथा २० ] लोभकसायस्स पज्जायणामाणि मिप्रायः। वंचना विप्रलम्भनं । अनृजुता योगवक्रता । ग्रहणं मनोज्ञार्थ परकीयमुपादाय निन्हवनं । गहनं चान्तर्गतवंचनाभिप्रायस्य निभृताकारेण गूढमंत्रता। मनोज्ञमार्गणं मनोज्ञस्यार्थस्य परतो मिथ्याविनयादिभिरुपचारैः स्वीकरणाभिप्रायः । कल्को दम्भः। कुहकमसद्भूत-मंत्र-तंत्रोपदेशादिभिर्लोकोपजीवनम् । निगृहनं अन्तर्गतदुराशयस्य बहिराकारसंवरणम् । छन्नं छाप्रयोगोऽतिसन्धान विश्रम्भघातादिरित्यर्थः । त एते मायापर्याया एकादश प्रतिपत्तव्याः । ___ मायाथ सातियोगो निकृतिरथो वंचना तथाऋजुता । ग्रहणं मनोज्ञमार्गण-कल्क-कुहक-गूहनच्छन्नम् ॥ ३ ॥ (३६) कामो राग णिदाणो छंदो य सुदो य पेज्ज दोसो य । णेहाणुराग आसा इच्छा मुच्छा य गिद्धी य ॥४-८॥ (३७) सासद पत्थण लालस अविरदि तण्हाय विज्ज जिब्भा य। लोभस्त णामधेज्जा वीसं एगढ़िया भणिदा ॥५-०॥ ६६. काम-राग-निदान-छंद-सुत-प्रेय-दोषप्रभृतयः त एते लोभस्य नामधेयत्वेन रूढा विंशतिरेकार्थाः शब्दाः पूर्वसूरिभिरुपवर्णिताः प्रत्येतव्याः इति संक्षेपतः सूत्रार्थः । तत्र कमनं कामः इष्टदारापत्यादिपरिग्रहाभिलाष इति प्रथमो लोभपर्यायः। रंजनं रागो विप्रलन्भनका नाम वञ्चना है। योगकी कुटिलताका नाम अनृजुता है । दूसरेके मनोज अर्थको प्राप्त कर उसका अपलाप करनेका नाम ग्रहण है। और इसका अर्थ गहन करने पर उसका तात्पर्य है-भीतरी वञ्चनाके अभिप्रायका निभृताकाररूपसे गूढ मंत्र करना। मिथ्या विनय आदि उपचारों द्वारा दसरेसे मनोज्ञ अर्थके स्वीकार करनेके अभिप्रायका नाम मनोझमागेण है । दम्भका नाम कल्क है । झूठे मन्त्र, तन्त्र और उपदेश आदि द्वारा लोकका उपजीवन करना कुहक है। भीतरी दुराशयका बाह्यमें संवरण करना ( छिपाना ) निगूहन है। छद्मप्रयोग करना छन्न है । अतिसन्धान और विश्रम्भघात आदि छन्न कहलाता है यह इसका तात्पर्य है । ये सब ग्यारह शब्द मायाके पर्यायवाची जानने चाहिए। माया, सातियोग, निकृति, वञ्चना, अनृजुता, ग्रहण, मनोहमार्गण, कल्क, कुहक, गूहन और छन्न ये मायाके पर्यायनाम हैं ॥३॥ * काम, राग, निदान, छन्द, सुत या स्वत, प्रेय, दोष, स्नेह, अनुराग, आशा, इच्छा, मूर्छा, गृद्धि, साशता या शास्वत, प्रार्थना, लालसा, अविरति, तृष्णा, विद्या और जिह्वा ये बीस लोभके एकार्थक नाम कहे गये हैं ॥४, ५-८९, ९१॥ ६. काम, राग, निदान, छन्द, सुत, प्रेय और दोष आदि ये सब लोभके नामधेयरूपसे रूढ़ बीस एकार्थक शब्द पूर्वाचार्योद्वारा कहे गये जानने चाहिए यह संक्षेपमें गाथासूत्रोंका अर्थ है। उनमेंसे काम शब्दकी व्युत्पत्ति है-कमनं कामः । इष्ट स्त्री और इष्ट पति या पुत्र १. ताप्रतो -प्रयोग इति सन्धानं इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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