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________________ १७६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [चउट्ठाणं ८ $४३. किं कारणं ? वट्टमाणसमयमेतविसयत्तादो। ण च वट्टमाणसमयप्पणाए दवणट्ठाणाणं संभवो अत्थि, कालभेदेण विणा तेसिमसंभवादो । तदो वट्टमाणमेत्तुज्जुवत्थग्गाहिणो एदस्स विसये ढवणट्ठाणमट्ठाणं पुव्युत्तण्णाएण पलिवीचि-उच्चट्ठाणाणि च ण संभवंति सिद्धं । * सद्दणयो णामहाणं संजमहाणं खेत्तट्ठाणं भावहाणं च इच्छदि । ४४. होउ णाम पलिवीचि-उच्चट्ठाणाणमेस्थासंभवो, संगह-ववहारेहिं चेव तेसिमोसारियत्तादो! तहा अद्धट्ठाण-ट्ठवणट्ठाणाणं पि असंभवो, उजुसुदविसए चेव तेसिमवत्थुत्तमुवगयाणमेत्थ संभवविरोहादो । कथं पुण दव्व-पयोगट्ठाणाणमुजुसुदे संभवंताणमेत्थावत्थुत्तमिदि ? बुच्चदे–ण ताव दव्वट्ठाणस्सेत्थ संभवो, सुद्धपज्जवट्ठिये एदम्मि णये पडिसमयविणासिपजायं मोत्तूण दव्वस्स संभावाणभुवगमादो। ण उजुसुदेण वियहिचारो, एदम्हादो तस्स थूलविसयत्तब्भुवगमादो। तहा पयोगट्ठाणं पि एत्थ ण संभवइ । किं कारणं? पयोगो हि णाम मण-वचि-कायाणं परिप्फंदलक्खणो किरियाभेदो । ण च सो एत्थ संभवइ, खणक्खयिणो भावस्स समयमणवट्ठिदस्स किरियापजायकरता है। $ ४३. क्योंकि ऋजुसूत्रका विषय वर्तमान समयमात्र है। और वर्तमान समयकी विवक्षामें स्थापनास्थान और अद्धास्थान सम्भव नहीं हैं, क्योंकि कालभेदको स्वीकार किये विना उनको स्वीकार करना असम्भव है । इसलिये वर्तमानमात्र ऋजु अर्थको ग्रहण करनेवाले इस नयके विषयमें स्थापनास्थान और अद्धास्थान तथा पूर्वोक्त न्यायसे पलिवीचिस्थान और उच्चस्थान सम्भव नहीं हैं यह सिद्ध हुआ। * शब्दनय नामस्थान, संयमस्थान, क्षेत्रस्थान और भावस्थानको स्वीकार करता है। ४४. शंका-इस नयके विषयरूपसे पलिवीचिस्थान और उच्चस्थान सम्भव मत होओ, क्योंकि संग्रहनय और व्यवहारनयके द्वारा ही उनका अपसरण कर दिया गया है। या अद्धास्थान और स्थापनास्थान भी सम्भव मत होओ, क्योंकि ऋजुसूत्रके विषयरूपसे ही अवस्तुपनेको प्राप्त हुए उनका इस नयके विषयरूपसे सम्भव होनेमें विरोध है। परन्तु ऋजुसूत्रनयमें द्रव्यस्थान और प्रयोगस्थान सम्भव हैं, उनका इस नयमें अवस्तुपना कैसे बनता है ? समाधान-द्रव्यस्थान तो इस नयमें सम्भव नहीं है, क्योंकि शुद्ध पर्यायार्थिकरूप इस नयमें प्रति समय विनाशको प्राप्त होनेवाली पर्यायको छोड़कर द्रव्य इस नयके विषयरूपसे नहीं स्वीकार किया गया है। ऋजुसूत्रके साथ व्यभिचार नहीं आता, क्योंकि इसकी अपेक्षा उसका स्थूल विषय स्वीकार किया गया है। उसी प्रकार प्रयोगस्थान भी इस नयमें सम्भव नहीं है, क्योंकि मन, वचन और कायके परिस्पन्दलक्षण क्रियाभेदका नाम प्रयोग है, परन्तु वह इस नयमें सम्भव नहीं है, क्योंकि क्षणक्षयी और एक समयके बाद अनवस्थित रहनेवाले भावमें क्रियापर्यायरूप
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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