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________________ १५३ गाथा ७१] विदियगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणा कायव्वा । तत्थ णगराइसरिसो त्ति वुत्ते पव्वदसिलाभेदसरिसो कोहपरिणामो घेत्तव्यो । एदं सव्वकालमविणाससाधम्मं पेक्खियूण णिदरिसणं भणिदं । जहा पव्वदसिलामेदो केण वि कारणंतरेण समुन्भूदसरूवो पुणो ण कदाई पयोगंतरेण संधाणमागच्छह, तदवत्थो चेव चिट्ठदि । एवं जो कोहपरिणामो कस्स वि जीवस्स कम्हि वि पुरिसविसेसे समुप्पण्णो ण केण वि पयोगंतरेणुवसमं गच्छइ, णिप्पडिकारो होदूण तम्मि भवे तहा चेवावचिट्ठदे, जम्मंतरं पि तज्जणिदसंसकारो अणुबंधदि, सो तारिसो तिव्वयरो कोहपरिणामो णगराइसरिसो त्ति भण्णदे।। ७. एवं पुढविराइसरिसो वि वत्तव्यो । णवरि पुन्विल्लादो एसो मंदाणुभागो, चिरकालमवट्टिदस्स वि एदस्स पुणो पयोगंतरेण संधाणुवलंभादो'। तं जहागिम्हकाले पुढविभेदो पुढवीए रसक्खयेण फुटुंतीए पयट्टो। पुणो पाउसकाले जलप्पवाहेणावूरिज्जमाणो तक्खणमेव संधाणमागच्छइ । एवं जो कोहपरिणामो चिरकालमवट्टिदो वि संतो पुणो वि कारणंतरेण गुरुवदेसादिणा उवसमभावं पडिवजदि सो तारिसो तिव्वपरिणामभेदो पुढविराइसरिसो ति विण्णायदे । एत्थ उभयत्थ वि राइसद्दो अवयवविसरणप्पयभेदपज्जायवाचओ घेत्तव्यो । ८. तहा वालुगराइसरिसो ति वुत्ते णदीपुलिणादिसु वालुगरासिमझकरना चाहिये । उनमेंसे नागराजिसदृश ऐसा कहनेपर पर्वतशिलाभेदसदृश क्रोध परिणाम लेना चाहिए । सर्व कालोंमें अविनाशरूप साधर्म्यको देखकर यह उदाहरण कहा है। जैसे पर्वतशिलाभेद किसी भी दूसरे कारणसे उत्पन्न होकर पुनः कभी भी दूसरे उपायद्वारा सन्धानको प्राप्त नहीं होता, तदवस्थ ही बना रहता है। इसी प्रकार जो क्रोध परिणाम किसी भी जीवके किसी भी पुरुषविशेषमें उत्पन्न होकर किसी भी दूसरे उपायसे उपशमको नहीं प्राप्त होता है, प्रतीकार रहित होकर उस भवमें उसी प्रकार बना रहता है, जन्मान्तरमें भी उससे उत्पन्न हुआ संस्कार बना रहता है, वह उस प्रकारका तीव्रतर क्रोधपरिणाम नगराजिसदृश कहा जाता है। ६७. इसीप्रकार पृथिवीराजिसदृश क्रोधका भी व्याख्यान करना चाहिए। इतनी ता है कि पूर्वके क्रोधसे यह मन्द अनुभागवाला है, क्योंकि चिरकाल तक अवस्थित होने पर भी इसका पुनः दूसरे उपायसे सन्धान हो जाता है। यथा-ग्रीष्मकालमें पृथिवीका भेद हुआ अर्थात् पृथिवीके रसका क्षय होनेसे वह भेदरूपसे परिणत हो गई। पुनः वर्षाकालमें जलके प्रवाहसे वह दरार भरकर उसी समय संधानको प्राप्त हो गई। इसीप्रकार जो क्रोधपरिणाम चिरकाल तक अवस्थित रहकर भी पुनः दूसरे कारणसे तथा गुरुके उपदेश आदिसे उपशमभावको प्राप्त होता है वह उस प्रकारका तीव्र परिणामभेद पृथिवीराजिसदृश जाना जाता है । यहाँ दोनों स्थलोंपर भी 'राजि' शब्द अवयवके विच्छिन्न होनेरूप भेद पर्यायका वाचक लेना चाहिए। $८. उसीप्रकार 'वालुकाराजिसदृश' ऐसा कहनेपर नदीके पुलिन आदिमें वालुका १ ता०प्रती सं [ बं ] धाणुवलंभादो इति पाठः । . २०
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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