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________________ १४२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ प्रथमसमयः प्रथमकषाय इत्यर्थः । एवं चरिमसमय इत्यत्रापि बोद्धव्यं । शेषं पूर्ववद्वथाख्येयं । तदो कसायोवजुत्ताणं तीहिं सेढीहिं अप्पाबहुअपरूवणट्ठमेदं गाहापच्छद्धमोइण्णमिदि सिद्धं । एवमेदस्स गाहापच्छद्धस्स पडिबद्धत्थपरूवणं कादूण संपहि ताओ काओ तिण्णि सेढीओ त्ति आसंकाए पुच्छासुत्तमुत्तरं भणइ * तं जहा। ३०३. सुगमं । * विदियादिया पढमादिया चरिमादिया ३।। ६३०४. एवमेदाओ तिण्णि सेढीओ त्ति भणिदं होइ । का सेढी णाम १ सेढी पंती अप्पाबहुअपरिवाडि ति एयत्थो। तत्थ जम्मि अप्पाबहुअपरिवाडिम्मि माणसण्णिदविदियकसायोवजुत्ते आदि कादूण थोवबहुत्तपरिक्खा कीरदे सा विदियादिया णाम । सा वुण तिरिक्ख-मणुसेसु होइ, तत्थ माणोवजुत्ताणं थोवभावेण सव्वहेट्ठिमत्तदंसणादो । तहा जम्हि अप्पाबहुअपरिवाडिम्मि कोहसण्णिदपढमकसायोवजुत्ताणं थोवभावेण पढमणिद्देसेण पढमादिया णाम । सा वुण देवगदीए होइ, तत्थ कोहोवजुत्ताणं सव्वहेडिमत्तदंसणादो। तहा जम्हि थोवबहुत्तपरिवाडीए लोभसण्णिदचरिमकसायोवप्राप्त होता है वह समय अर्थात् सम्पराय-कषाय कहलाता है इस प्रकार समय शब्दका यह एक अर्थ है । तथा प्रथम जो समय वह प्रथम समय है। प्रथम कषाय यह उसका अर्थ है। इसी प्रकार 'चरिमसयय' इस पदमें भी जानना चाहिए । शेष व्याख्यान पहलेके समान करना चाहिए। इसलिए कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका तीन श्रेणियोंद्वारा अल्पबहुत्वका कथन करनेके लिये गाथाका उत्तरार्ध आया है यह सिद्ध हुआ। इस प्रकार गाथाके इस उत्तरार्धसे सम्बन्ध रखनेवाले अर्थका कथनकर अब वे तीन श्रेणियाँ कौनसी हैं ऐसी आशंका होनेपर आगेके पृच्छासूत्रको कहते है * वह जैसे। $ ३०३. यह सूत्रवचन सुगम है। * द्वितीयादिका श्रेणि, प्रथमामिका श्रेणि और चरमादिका श्रेणि ३ । $ ३०४. इस प्रकार ये तीन श्रेणियाँ हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका-श्रेणि किसे कहते हैं ? समाधान-श्रेणि, पंक्ति और अल्पबहुत्वपरिपाटी ये तीनों पद एकार्थक हैं। उनमेंसे मानसंज्ञावाली दूसरी कषायसे उपयुक्त जिस अल्पबहुत्व परिपाटीसे लेकर अल्पबहुत्वकी परीक्षा की जाती है वह द्वितीयादिका परिपाटी कहलाती है। परन्तु वह तिर्यश्चों और मनुयोंमें होती है, क्योंकि उनमें मानकषायसे उपयुक्त हुए जीवोंका स्तोकभावसे सबसे अधस्तनपना देखा जाता है । तथा जिस अल्पबहुत्वपरिपाटीमें क्रोध संज्ञावाली प्रथम कषायसे उपयुक्त हुए जीवोंका स्तोकपनेकी अपेक्षा प्रथम पदका निर्देश किया गया है वह प्रथमादिका परिपाटी कहलाती है। परन्तु वह देवगतिमें होती है। तथा जिस अल्पबहुत्वपरिपाटीमें लोभसंज्ञावाली अन्तिम कषायसे उपयुक्त हुए जीवोंका सबसे स्तोकपना है वह
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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