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________________ ११२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ जोगद्धट्ठाणजीवा पढमट्ठाणजीवेहिंतो दुगुणा भवंति । पुणो एदस्स दुगुणवड्ढिवाणस्सुवरि विसेसाहियसरूवेण तेत्तियमेत्तमद्धाणं गंतूण अण्णेगं दुगुणवड्ढिट्ठाणमुप्पजइ । णवरि पुयिल्लपक्खेवेहितो संपहियपक्खेवा दुगुणा होति त्ति वत्तव्वं । पुणो एदेण विहिणा आवलियाए असंखेज्जदिभागदुगुणमेत्तभागवड्ढीओ अवद्विदपक्खेवभागहारपडिबद्धाओ उवरि गंतूण तत्थेगम्मि उवजोगट्टाणे जवमझं होइ, तत्तो उवरिमट्ठाणेसु विसेसहाणिकमेण जीवाणमवट्ठाणदसणादो। णवरि जवमज्झादो हेट्ठिमसयलदुगुणवड्विट्ठाणेहितो उवरिमदुगुणहाणिट्ठाणंतराणि संखेजगुणाणि ति घेत्तव्वं, हेडिमद्धाणादो उवरिमद्धाणस्स संखेजगुणत्तादो। ण चेदमसिद्धं, उवरिमसुत्तेण तेसिं तहाभावसिद्धीदो । कि तं उवरिमसुत्तमिदि चे तस्सेदाणिमवयारो कीरदे * तं जहा-हाणाणं संखेजदिभागे । ६ २४८. एदमणंतरणि द्दिटुं जवमज्झट्ठाणं सयलद्धट्ठाणाणमादीदो पहुडि संखेजदिमागे समुप्पण्णमिदि वुत्तं होइ । तदो द्वाणाणं संखेजदिमागे चेव जवमज्झट्ठाणं होदूण पुणो उवरिमसयलद्धाणम्मि विसेसहाणिसरूवेणावलियाए असंखेजदिभागमेत्तगुणहाणिट्ठाणंतराणि हेट्ठिमगुणवड्डिट्ठाणेहिंतो संखेजगुणाणि समयाविरोहेण णेदव्वाणि त्ति सिद्धं । प्राप्त होते हैं वे प्रथम स्थानके जीवोंसे दूने होते हैं। पुनः इस द्विगुणवृद्धिस्थानके ऊपर विशेष अधिकरूपसे उतने ही स्थान जाकर एक दूसरा द्विगुणवृद्धिस्थान उत्पन्न होता है। इतनी विशेषता है कि पिछले द्विगुणवृद्धिस्थानोंके प्रक्षेपोंसे वर्तमान द्विगुणवृद्धिस्थानोंके प्रक्षेप दूने होते हैं ऐसा यहाँ कहना चाहिए । पुनः इस विधिसे अवस्थित प्रक्षेप-भागहारसे सम्बन्ध रखनेवाली आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण द्विगुणभागवृद्धियाँ हो जानेपर वहाँपर प्राप्त हुए एक उपयोग-अद्धास्थानमें यवमध्य होता है, क्योंकि उससे आगेके स्थानोंमें विशेष हानिके क्रमसे जीवोंका अवस्थान देखा जाता है । इतनी विशेषता है कि यवमध्यसे पूर्वके समस्त द्विगुणवृद्धिस्थानोंसे आगेके द्विगुणहानिस्थान संख्यातगुणे हैं ऐसा यहाँपर ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि पूर्वके अध्वानसे आगेका अध्वान संख्यातगुणा है। और यह असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि आगेके सूत्रसे उनके उस प्रकारसे होनेकी सिद्धि होती है। वह आगेका सूत्र कौनसा है ऐसी आशंका होनेपर उसका इस समय अवतार करते हैं * वह यवमध्यस्थान जितने स्थान हैं उनके संख्यातवें भागमें होता है । $ २४८. यह पूर्व में जो यवमध्यस्थान निर्दिष्ट कर आये हैं वह समस्त अद्धास्थानोंके प्रारम्भसे लेकर संख्यातवें भाग जानेपर उत्पन्न होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इसलिए समस्त स्थानोंके संख्यातवें भागप्रमाण स्थान जानेपर ही यवमध्यस्थान होकर पुनः आगेके समस्त अध्वानोंमें विशेष हानिके क्रमसे आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण गुणहानिस्थान पिछले गुणवृद्धिस्थानोंसे समयके अविरोधपूर्वक संख्यातगुणे होते हैं यह सिद्ध हुआ । विशेषार्थ—यहाँपर यवमध्यस्थानके प्राप्त होने तक पूर्व में कितनी द्विगुणवृद्धियाँ होती २. ता प्रती उवरिमट्ठ गुण- इति पाठः ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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