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________________ गाथा ६७ ] पंचमगाहासुत्तस्स अत्थपरूवणां $ १७८. सुगममेदं पयदत्थोवसंहारवक्कं । एवमेदं समानिय संपहि पंचमगाहासुत्तस्स जहावसरपत्तमत्थविहासणं कुणमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * केवडिगा उवजुत्ता सरिसीसु च वग्गणाकसाएसु चेति एदिस्से गाहाए अत्थविहासा । ८५ $ १७९. सुगममेदं, एदिस्से पंचमीए गाहाए अत्थविहासा एत्तो अहिकीरदिति पदुष्पायणफलदात्तो | णवरि गाहाए पुव्वद्धमिदि सहपरमुच्चारिय तेण देसामासयेण सव्विस्से चैव गाहाए सपुच्चपच्छद्धाए परामरसो एत्थ कओ दट्ठव्वो । एसा च गाहा कोहादिकसायोवजुत्ताणं परूवणकुदाए अट्टण्हमणियोगद्दाराणं सूचणट्टमागया । तदो सूचणासुत्तमेदमिति पदुप्पायणमाह * एसा गाहा सूचणासुत्तं । $ १८०. सुगमं । संपहि किमेदेण सूचिजमाणमत्थजादमिच्चासंकाए उत्तरमाह* एदीए सूचिदाणि अट्ठ अणिओगद्दाराणि । $ १८१. एदीए गाहाए कोहादिकसायोवजोगजुत्तजीवाणं परूवणट्टदाए अट्ठ अणियोगद्दारा णि सूचिदाणि ति भणिदं होइ । संपहि काणि ताणि अट्ठ अणिओगद्दाराणि ति आसंकिय पुच्छासुत्तमाह- $ १७८. प्रकृत अर्थका उपसंहार करनेवाला यह वचन सुगम है । इस प्रकार इसको समाप्त कर अब पाँचवीं सूत्रगाथा के अवसरप्राप्त अर्थका विशेष व्याख्यान करते हुए आगे सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * 'सदृश कषायोपयोगवर्गणाओंमें कितने जीव उपयुक्त हैं' इस गाथाके अर्थका विशेष व्याख्यान करते हैं । $ १७९. यह वचन सुगम है, क्योंकि इस पाँचवीं गाथाके अर्थका विशेष व्याख्यान अधिकार प्राप्त है इस बातका कथन करना इसका फल है । इतनी विशेषता है कि गाथा के पूर्वार्धका शब्दपरक उच्चारण करके उससे देशामर्ष कभावसे पूर्वार्ध और उत्तरार्ध सहित पूरी गाथाका परामर्श यहाँपर किया गया जानना चाहिए। यह गाथा क्रोधादि कषायों में उपयुक्त हुए जीवोंका कथन करनेके लिए आठों अनुयोगद्वारोंका सूचन करनेके लिए आई है । इसलिए यह सूचनासूत्र है इस बातका कथन करनेके लिए कहते हैं— * यह गाथा सूचनासूत्र है । १८०. यह वचन सुगम है। अब इसके द्वारा क्या अर्थसमूह सूचित किया जा वाला है इस आशंकाका उत्तर देते हैं * इसके द्वारा आठ अनुयोगद्वार सूचित किये गये हैं। $ १८१. क्रोधादि कषायोंमें उपयुक्त हुए जीवोंका कथन करनेके लिए इस गाथा द्वारा आठ अनुयोगद्वार सूचित किये गये हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है । अब वे आठ अनुयोगद्वार कौनसे हैं ऐसी आशंका कर पृच्छासूत्र कहते हैं— 1
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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