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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ * जहणए कसायुदयठ्ठाणे उक्कस्सियाए माणोवजोगद्धाए जीवा असंखेज गुणा । $ १७०. सव्वजहण्णय मणुभागोदयद्वाणं तसजीवपाओग्गमेत्थ जहण्णकसायुदयामिदि विवक्खियं । तेण जहण्णए कसायुदट्ठाणे उक्कस्समाणोवजोगवा - पविद्धे वट्टमाण जीवरासी असंखेजगुणो त्ति सुत्तत्थ संबंधो । एसो वि आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्तो चैव, एक्केक्कम्मि कसायुदयट्ठाणे णिरुद्धे आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्तो चैव तस जीवरासी होदि ति पुव्वमेव णिण्णीयत्तादो । णवरि उक्कस्सकसायुदट्ठाणादो जहणकसायुदयद्वाणस्स सुलहत्तेण पुव्विल्लरासीदो एसो असंखेजगुण जादो। एत्थ गुणगारो आवलियाए असंखेज दिभागो । ८० * जहण्णियाए माणोवजोगद्धाए जीवा असंखेज्जगुणा । $ १७१. एत्थ जहणकसायुदय द्वाणग्गहणमणुवट्टदे, तेणेव महिसंबंधो कायव्वोजण कसायुदट्ठाणे जहण्णियाए माणोवजोगाए च अकमेण परिणदा जीवा पुव्विल्लेहिंतो असंखेज्जगुणा ति । एत्थ कारणं सुगमं । गुणगारो च आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्तो । * अणुक्कस्समजहण्णासु माणोवजोगद्धासु जीवा असंखेज्जगुणा । $ १७२. एसो वि जीवरासी आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्तो होदूण पुव्विल्लादो असंखेज्जगुणो हो । कारणं सुगमं । * उनसे जघन्यकषाय उदयस्थानमें और उत्कृष्ट मानकषायसम्बन्धी उपयोगकालमें जीव असंख्यातगुणे हैं । $ १७०. सबसे जघन्य अनुभागोदयस्थान त्रसजीवोंके योग्य जघन्य कषाय-उदयस्थान है ऐसी यहाँपर विवक्षाकी गई है। तदनुसार उत्कृष्ट मानोपयोगकालसे सम्बन्ध रखनेवाले जघन्य कषायोदयस्थान में विद्यमान जीवराशि असंख्यगुणी है ऐसा यहाँ सूत्रका अर्थके साथ सम्बन्ध करना चाहिए। यह जीवराशि भी आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही है, क्योंकि एक-एक कषाय- उदयस्थानमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही त्रसराशि होती है, इस बातका पहले ही निर्णय कर आये हैं । इतनी विशेषता है कि उत्कृष्ट कषायोद्यस्थानसे जघन्य कषायोदयस्थान सुलभ है, इसलिए पूर्वोक्त राशिसे यह राशि असंख्यातगुणी हो जाती है । यहाँपर गुणकार आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । * उनसे जघन्य मानकषायोपयोगकालमें जीव असंख्यातगुणे हैं । $ १७१. यहाँपर 'जघन्य कषाय - उदयस्थान' पदकी अनुवृत्ति होती है । इसलिए ऐसा सम्बन्ध करना चाहिए । जघन्य कषाय उदयस्थानमें और जघन्य मानोपयोगकालमें युगपत् परिणत हुए जीव पिछले जीवोंसे असंख्यातगुणे हैं । यहाँपर कारणका कथन सुगम है । गुणकार आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है । * उनसे अनुत्कृष्ट- अजघन्य मानोपयोगकालोंमें जीव असंख्यातगुणे हैं । $ १७२. यह भी जीवराशि आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण होकर पिछली राशिसे असंख्यातगुणी है । कारणका कथन सुगम है ।
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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