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________________ आय-उदयस्थान संज्ञा है। ७८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ ... $ १६७. उक्कस्सकसायोदयट्ठाणं णाम उक्कस्साणुभागोदयजणिदो कसायपरिणामो असंखेजलोयमेयभिण्णाणमझवसाणट्ठाणाणं चरिमज्झवसाणट्ठाणमिदि वुत्तं होदि । 'उक्कस्समाणोवजोगद्धाए' त्ति वुत्ते माणकसायस्स उक्कस्सकालोवजोगवग्गणाए गहणं कायव्वं । तदो एदेहिं दोहिं उक्कस्सपदेहिं माणकसायपडिबद्धेहिं अण्णोण्णसंजुत्तेहिं परिणदा तसजीवा थोवा त्ति सुत्तत्थसंबंधो। कुदो एदेसिं थोवत्तमवगम्मदे ? ण, दोण्हं पि उक्कस्सभावेण परिणमंताणं जीवाणं सुट्ट, विरलाणमुवएसादो। किं माणमेदेसि ? आवलियाए असंखेजदिभागो। जइ वि उक्कस्समाणोवजोगद्धाए असंखेजसेढिमेत्तजीवाणमवट्ठाणसंभवो तो वि उक्कस्सकसायुदयहाणे णिरुद्धे तत्थावलियाए असंखेजदिभागमेत्तो चेव जीवरासी होदि, पयारंतरासंभवादो । * जहणियाए माणोवजोगद्धाए जीवा असंखेजगुणा। १६८. एत्थ उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे त्ति अहियारसंबंधो कायव्यो । तेण उक्कस्सए कसायुदयट्ठाणे जहणियाए माणोवजोगद्धाए च परिणदा जीवा पुव्वि $ १६७. उत्कृष्ट अनुभागके उदयसे उत्पन्न हुए तथा असंख्यात लोकप्रमाण अध्यवसान स्थानों में से अन्तिम अध्यवसानस्थानरूप कषाय परिणामकी उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थान संज्ञ 'उत्कुष्ट मानोपयोगाद्धामें' ऐसा कहनेपर मानकषायकी उत्कृष्ट कालोपयोगवर्गणाका ग्रहण करना चाहिए। इसलिए मानकषायसे सम्बन्ध रखनेवाले और परस्पर संयुक्त हुए इन दोनों उत्कृष्ट पदरूपसे परिणत हुए त्रसजीव सबसे थोड़े हैं ऐसा सूत्रके अर्थका सम्बन्ध करना चाहिए। शंका-इसका स्तोकपना किस प्रमाणसे जाता जाता है ? समाधान नहीं, क्योंकि दोनों ही पदोंके उत्कृष्टभावसे परिणत हुए जीव बहुत विरल होते हैं ऐसा परमागमका उपदेश है। शंका-इनका प्रमाण क्या है ? समाधान—इनका प्रमाण आवलिके असंख्यात भागमात्र है। यद्यपि मानकषायके उत्कृष्ट उपयोगकालमें असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण त्रसजीवोंका अवस्थान सम्भव है तो भी उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानसे युक्त उसमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण ही जीवराशि होती है, क्योंकि यहाँ अन्य प्रकार सम्भव नहीं है। विशेषार्थ—यहाँ उदयस्थानका अर्थ कषायपरिणाम और उपयोगाद्धाका अर्थ कषायपरिणामका काल लिया है। ये दोनों जिन जीवोंके उत्कृष्ट होते है उनकी संख्या आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाणसे अधिक नहीं पाई जाती यह उक्त कथनका तात्पर्य है। आगे भी इसी प्रकार तात्पर्य घटित कर लेना चाहिए। * उनसे जघन्य मानकषायसम्बन्धी उपयोगकालमें स्थित हुए जीव असंख्यात गुणे हैं। १६८. इस सूत्रमें 'उत्कृष्ट कषाय उदयस्थानमें' अधिकारवश इस पदका सम्वन्ध कर लेना चाहिए । इससे उत्कृष्ट कषाय-उदयस्थानमें और मानकषायके जघन्य उपयोगकालमें
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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