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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो ७ सुद्धसेसस्स तव्ववएसावलंबणादो। वग्गणाओ विसेसाहियाओ, जहण्णकालोवजोगवग्गणाणं पि एत्थ पवेसदसणादो। एवं माण-माया-लोहाणं पि सत्थाणप्पाबहुअं कायव्वं । $ १३२. संपहि परत्थाणप्पाबहुए भण्णमाणे सव्वत्थोवाओ माणस्स कालोवजोगवग्गणाओ। कोहस्स कालोवजोगवग्गणाओ विसेसाहियाओ। मायाए कालोवजोगवग्गणाओ विसेसाहिया० । लोहस्स कालोवजोगवग्गणा० विसेसाहिया० । विसेसो पुण सव्वत्थावलियाए असंखेजदिभागमेत्तो । एवमेसा ओघेण परत्थाणप्पाबहुअपरूवणा कया । तिरिक्ख-मणुसगदीसु वि एवं चेव वत्तव्वं, विसेसाभावादो। १३३. आदेसेण णेरइ० सव्वत्थोवाओ लोभस्स कालोवजोगवग्गणाओ । मायाए कालोवजोगवग्गणाओ संखेजगुणाओ । माणस्स कालोवजोगवग्गणा० संखेजगुणा० । कोहस्स कालोवजोगवग्गणा० संखेजगुणा० । एवं देवगदीए वि । णवरि कोहादो आढविय पच्छाणुपुव्वीए णेदव्व मिदि । ६१३४. संपहि भावोवजोगवग्गणाणं परूवणे भण्णमाणे घउण्हं पि कसायाणमत्थि भावोवजोगवग्गणाओ। पमाणं वुच्चदे-चउण्हं पि कसायाणं पादेकमसंखेजलोगमेत्तीओ भावोवजोगवग्गणाओ होति । अप्पाबहुअं.दुविहं-सत्थाण-परत्थाणमेदेण । सत्थाणे पयदं । सव्वत्थोवा कोहस्स जहण्णभावोवजोगवग्गणा । किं कारणं ? सव्वउससे क्रोधकी कालोपयोगवर्गणाऐं विशेष अधिक हैं, क्योंकि जघन्य कालोपयोगवर्गणाओंका भी इनमें प्रवेश देखा जाता है। इसी प्रकार मान, माया और लोभकषायका भी स्वस्थान अल्पबहुत्व करना चाहिए। $ १३२. अब परस्थान अल्पबहुत्वका कथन करनेपर मानकषायकी कालोपयोगवर्गणाऐं सवसे थोड़ी हैं। उनसे क्रोधकषायकी कालोपयोगवर्गणाएं विशेष अधिक हैं। उनसे मायाकषायकी कालोपयोगवर्गणाऐं विशेष अधिक हैं और उनसे लोभकषायकी कालोपयोगवर्गणाएं विशेष अधिक हैं। विशेषका प्रमाण सर्वत्र आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। इस प्रकार यह ओघसे परस्थान अल्पबहुत्वप्ररूपणा की। तियश्च और मनुष्यगतिमें भी इसी प्रकार कथन करना चाहिए, क्योंकि ओघसे इनमें उक्त अल्पबहुत्वकी अपेक्षा कोई भेद नहीं है। १३३. आदेशसे नारकियोंमें लोभकषायकी कालोपयोगवर्गणाऐं सबसे स्तोक हैं। उनसे मायाकषायको कालोपयोगवर्गणाऐं संख्यातगुणी हैं। उनसे मानकषायकी कालोपयोगवर्गणाऐं संख्यातगुणी हैं। उनसे क्रोधकषायकी कालोपयोगवर्गणाऐं संख्यातगुणी हैं। इसी प्रकार देवगतिमें भी कथन करना चाहिए। इतनी विशेषता है कि क्रोधसे आरम्भ कर पश्चादानुपूर्वीसे जानना चाहिए। ..$ १३४. अब भावोपयोगवर्गणाओंका कथन करनेपर चारों ही कषायोंकी भावोपयोगवर्गणाएं हैं। प्रमाणका कथन करते हैं--चारों ही कषायोंमेंसे प्रत्येककी असंख्यातल भावोपयोगवर्गणाएं होती हैं । स्वस्थान और परस्थानके भेदसे अल्पबहुत्व दो प्रकारका है। स्वस्थानका प्रकरण है। क्रोधकषायकी जघन्य भावोपयोगवर्गणा सबसे स्तोक है, क्योंकि
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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