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________________ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ उवजोगो७ * जे संखेजलोभोवजोगिगा भवा ते भवा असंखेजगुणा । * जे संखेजमायोवजोगिगा भवा ते भवा विसेसाहिया। * जे संखेन्जमाणोवजोगिगा भवा ते भवा विसेसाहिया । * जे संखेजकोधोवजोगिगा भवा ते भवा विसेसाहिया। $ १२२. सुगमत्वान्नात्र किंचिद्वक्तव्यमस्ति । णवरि भवपरिवत्ते भण्णमाणे दसवस्ससहस्समादि कादूण समयुत्तरादिकमेण णेदव्वं जाव एकत्तीससागरोवमियभवे त्ति । एत्थ तिरिक्ख-मणुसगदीसु पयदप्पाबहुअमग्गणा ण संभवइ, तत्थ सव्वेसिं कसायाणं संखेजासंखेजोवजोगिगभवाणं समाणत्तेण पयदभेदाणुवलंभादो। * विदियगाहाए अत्थविहासा समत्ता। $ १२३. सुगममेदमुवसंहारवकं । संपहि तदियसुत्तगाहाए जहावसरपत्तमत्थविहासणं कुणमाणो सुत्तपबंधमुत्तरं भणइ * 'उवजोगवग्गणाओ कम्हि कसायम्हि केत्तिया होंति' त्ति एसा सव्वा वि गाहा पुच्छासुतं । $ १२४. एसा सव्वा वि तदियगाहा सपुव्वद्ध-पच्छद्धा पुच्छासुत्तमिदि भणिदं होदि। किमेदेण पुच्छिजदे ? कोहादिकसायविसयाणमुवजोगवग्गणाणं पमाणमोघादेसेहिं * जो लोभकषायके संख्यात-उपयोगवाले भव हैं वे भव असंख्यातगुणे हैं । * जो मायाकषायके संख्यात-उपयोगवाले भव हैं वे भव विशेष अधिक हैं। * जो मानकषायके संख्यात उपयोगवाले भव हैं बे भव विशेष अधिक हैं। * जो क्रोधकषायके संख्यात उपयोगवाले भव हैं वे भव विशेष अधिक हैं। $ १२२. सुगम होनेसे यहाँपर कुछ वक्तव्य नहीं है। इतनी विशेषता है कि भवपरिवर्तनका कथन करनेपर दस हजार वर्षसे लेकर एक समय अधिक आदिके क्रमसे इकतीस सागरोपम भव तक ले जाना चाहिए । यहाँ तिर्यश्चगति और मनुष्यगतिमें प्रकृत अल्पबहुत्व प्ररूपणा सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें सभी कषायोंके संख्यात-उपयोगवाले और असंख्यातउपयोगवाले भवोंके समान होनेसे प्रकृत भेद नहीं पाया जाता। * इस प्रकार दूसरी गाथाकी अथेविभाषा समाप्त हुई। 5 १२३. यह उपसंहारवाक्य सुगम है। अब अवसर प्राप्त तीसरी सूत्रगाथाके अर्थका व्याख्यान करते हुए आगेके सूत्रप्रबन्धको कहते हैं * 'उवजोगवग्गणाओ कम्हि कसायम्हि केत्तिया होति' इस प्रकार यह समस्त गाथा पृच्छासूत्र है। $ १२४. पूर्वार्ध और उत्तरार्धके साथ यह समस्त ही तीसरी गाथा पृच्छासूत्र है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शंका-इसके द्वारा क्या पृच्छा की गई है ?
SR No.090224
Book TitleKasaypahudam Part 12
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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